बढ़ते दुष्कर्मों का तमाशबीन समाज और कानून

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अब-जब भी आप कभी किसी वीराने से गुजरें और आपको सड़क पर औंधे मुँह पड़ी, खून से लथपथ उधड़े लिबासों और उजड़ी अस्मत के बाद घायल बदन के साथ कुछ महीनों की बच्ची (Rape Case) से लेकर एक बुजुर्ग महिला तक मिले तो चौकिएगा मत | यक़ीनन आप उसी भारत में है जहां नारी को देवी समझ कर पूजा जाता रहा है| सड़क पर पड़ी वह लावारिस किसी की बेटी, बहन, पत्नी, माँ है |

उसका नाम निर्भया, आसिफा, ट्विंकल या कुछ और हो सकता है | राक्षस और दानव बीते युगों की बात है और उन्हें सिर्फ पढ़ा और सुना गया है | मौजूदा युग में वहशी, दरिंदे और भूखे भेड़ियों में बदल चूका इंसान आज इनकी जगह ले रहा है | माफ़ कीजियेगा यह तुलना तो दानवों का भी अपमान है, क्योंकि शायद उनका भी ईमान-धर्म रहा होगा | तभी तो रावण ने सीता को चुराया लेकिन मर्जी के खिलाफ छुआ तक नहीं |

व्यंग्य : भाई की सियासत, पहले लात मारो फिर राखी बंधवालो

लेकिन यहाँ तो सगा बाप, मामा, चाचा, भाई, शिक्षक, मंदिर का पुजारी, मज्जिद का मौलवी और गुरूद्वारे के सेवादार से लगाकर हर एक नारी देह का इतना भूखा है कि उस भूख में आठ माह की दुधमुही बच्ची और साठ साल की वृद्धा तक हवस (Rape Case) मिटाने का जरिया बन गई | फिर इस सूची में पड़ोसी, ड्रायवर, दूधवाला, सब्जी वाला पेपर वाला, सहकर्मी जैसों का शामिल होना अब आश्चर्य नहीं रहा है|

कानून, प्रशासन, सरकारें, और समाज सब तमाशबीन है और हर घटना एक ख़बर जो कुछ दिन तक जिन्दा रहेगी, आक्रोश जाहिर होगा, निंदा होगी, कड़ी कार्यवाही के वादे और मोमबत्तियों के मोम के पिघलते ही फिर छा जायेगा गुमनामी का अँधेरा | फिर एक और दरिंदगी का इन्तजार | सिलसिला है, थमेगा नहीं |

खिसियानी ममता अब क्या नोचें?

इस सब (Rape Case) की वजह क्या है ? कानून, प्रशासन, सरकारें ? शायद हाँ | लेकिन सबसे अहम् किरदार को हम सदा नजरंअदाज कर देते है क्योंकि उस पर तोहमत लगाने से पहले हमें खुद के गिरेबां में झांकना होगा और खुद पर इल्जाम लेने से अच्छा है किसी और पर तोहमत लगा दो| जिक्र है समाज की जिम्मेदारी का |

कानून और सरकार का अपना किरदार है और निर्दोष वो भी नहीं है, लेकिन दुनिया का कोई भी कानून समाज की सोच में फैली गन्दगी नहीं मिटा सकता | इसे ऐसे समझा जा सकता है कि कौन सा कानून बाप, मामा, चाचा, भाई, शिक्षक पर निगरानी रख सकता है? घर के बाहर अपराध देखा जा सकता है लेकिन खुद के घर में छुपे पवित्र रिश्तों की चादर ओढ़े हैवानों की शिनाख्त भला कैसे हो? रूह के कांप जाने जैसे दृश्य और खबरों से भरे अख़बार भी सोई हुई इंसानियत को जगाने में नाकाम है ……..शायद यही कलयुग है …………….

क्या सियासत के दूध की पहली मक्खी है नीतीश कुमार?

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