खशोगी की हत्या पर उठते सवाल ?

0

अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद सउदी अरब ने मान ही लिया कि पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या इस्तांबुल स्थित उनके वाणिज्य दूतावास में 2 अक्टूबर को हुई। इसके बाद खशोगी के शरीर के अवशेष सऊदी राजदूत के घर के परिसर में मिलने की खबर सामने आई।  खशोगी एक ख्याति प्राप्त पत्रकार थे। सऊदी शाही खानदान के कुछ सदस्यों से उनके अच्छे संबंध थे। वह ब्रिटेन में सऊदी अरब के राजदूत रहे  प्रिंस तुर्की बिन फैसल के मीडिया सलाहकार भी रह चुके हैं।

जमाल खशोगी प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की घरेलू और विदेश नीतियों के कड़े आलोचक थे। धमकियों के कारण वे पिछले वर्ष सऊदी अरब छोड़ अमरीका आ गए। वहां अखबार ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ के स्तंभकार के तौर पर सेवाएं देने लगे। पिछले एक साल से प्रिंस मोहम्मद के खिलाफ लिख रहे थे।  तुर्की मूल की अपनी मंगेतर से विवाह करने के लिए खशोगी को कुछ दस्तावेज की ज़रूरत थी, जिसे लेने वे 28 सितंबर को इस्तांबुल स्थित सऊदी अरब के वाणिज्य दूतावास गए थे। तब उन्हें दोबारा आने के लिए कहा गया। सऊदी अरब सरकार का कहना है कि जब जमाल खशोगी दोबारा 2 अक्टूबर को वाणिज्य दूतावास में आए, तब कथित संदिग्ध तत्वों से उनका झगड़ा हो गया था। लड़ाई में उनकी मौत हो गई। यह भी कहा गया कि आरोपी इंस्ताबुल गए ही इसलिए क्योंकि खशोगी के सऊदी अरब लौटने की संभावना थी।

इस मामले से जुड़ी एक रिपोर्ट के मुताबिक, जमाल खशोगी को मारने के लिए सऊदी अरब सरकार के 15 अधिकारी इस्तांबुल गए थे। यह स्पष्ट नहीं कि आदेश उनकी हत्या का था या फिर उन्हें वापस सऊदी अरब लाने का। यह भी स्पष्ट नहीं है कि आदेश प्रिंस का था या किसी वरिष्ठ अधिकारी का। इस प्रकरण के बाद प्रिंस के दो सहयोगियों को निकाल दिया गया। हालांकि इस कार्रवाई से अमरीका संतुष्ट नहीं है और चाहता है कि पूरे मामले में प्रिंस की भूमिका सामने आए।

यह कोई सामान्य हत्या का मामला नहीं है। इससे अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर असर पड़ेगा। अमरीका की घरेलू राजनीति में भी इसका प्रभाव है। इस मामले ने ट्रंप को इतना सोचने में मजबूर कर दिया कि उन्होंने अपने विदेश मंत्री माइक पोंपियो को सऊदी अरब और तुर्की जांच करने भेज दिया। अमरीका-सऊदी और सऊदी-तुर्की के रिश्तों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी असर पड़ता है। प्रिंस मोहम्मद को बड़े सुधारक के रूप में देखा जाता है।

खशोगी के मामले में यह स्पष्ट है कि सभी अंतरराष्ट्रीय प्रावधानों का घोर उल्लंघन हुआ है। तुर्की चाहता तो सऊदी अधिकारियों को अपने देश से निकलने की इज़ाज़त नहीं देता। वह चाहता तो पुलिस को आदेश देकर जांच-पड़ताल करवा सकता था। यदि तुर्की ने संदिग्ध सऊदी अधिकारियों को जाने दिया, इसका मतलब साफ है कि उसके मन में कोई खिचड़ी जरूर पक रही  है। तथ्य यह भी है कि जमाल खशोगी की मौत और उससे पहले उन्हें प्रताड़ित करने के जो संदेह सामने आए। उसे देखते हुए तुर्की के पास अपने अधिकारियों को सऊदी वाणिज्य दूतावास में प्रवेश की अनुमति देने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था। यह जरूरी है सऊदी अरब खशोगी की हत्या से जुड़े सभी तथ्यों को उचित मूल से सामने रखे। जमाल खशोगी के कातिलों को जल्द पकड़ने के लिए प्रयास करना चाहिए।

Share.