जनता आक्रोशित, कांग्रेस की जीत

1

शायद मुझे निकालकर पछता रहे हैं आप
महफिल में इस ख्याल से फिर आ गया हूं मैं

प्रख्यात कवि और गज़लकार अदम गोंडवी की ये पंक्तियां वर्तमान चुनावी परिदृश्य पर एकदम सटीक बैठती हैं| मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में पिछले 15 वर्षों से वनवास भोग रही और मुख्यधारा से विलग कांग्रेस अब फिर सत्ता का स्वाद चखने को तैयार है| एक अदद जीत के लिए तरस रही कांग्रेस के लिए इस जीत ने संजीवनी बूटी की तरह कार्य किया हैं| अंतिम सांसें गिन रही कांग्रेस अब दोगुने उत्साह के साथ कार्य करने को तैयार है|

अब प्रश्न उठ रहा है कि आखिर मुख्यमंत्री के सिंहासन पर कौन विराजमान होगा| जहां मप्र में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य दोनों में से एक को चुनना पार्टी के लिए दुष्कर साबित हो रहा है वहीं छत्तीसगढ़ में तो स्थिति और भी विकट हो चुकी है वहां तो भूपेश बघेल, चरणदास महंत, टीएस सिंहदेव और पीएल पुनिया जैसे दिग्गजों के नाम सामने आए हैं| इनमें से एक का चयन किया जाना है| अब जिसके पास विधायकों और कार्यकर्ताओं का अधिक समर्थन होगा वह ही मुख्यमंत्री की कुर्सी के सबसे करीब होगा| इसके बाद भी पार्टी की पसोपेश की स्थिति दूर करने के लिए राहुल गांधी तो हैं ही| यह तो राजनीति की रीत है कि जिसके पास संख्या बल अधिक होगा वह ही दमदार स्थिति में होगा चाहे दूसरे प्रत्याशी का चरित्र कितना ही उजला क्यों न हो| इस संबंध में प्रसिद्ध शायर ने अल्लामा इकबाल ने क्या खूब कहा है कि :-

जम्हूरियत इक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिसमें
बंदों को गिना करते हैं, तौला नहीं करते

यदि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमनसिंह के कार्यों पर नज़र डाली जाए तो दोनों ने 2003 में दोनों प्रदेशों की जो दयनीय स्थिति थी, उसे पूरी तरह बदल कर रख दिया था| दिग्विजय के शासनकाल में पूरे प्रदेश की सड़कें अत्यंत जर्जर हो चुकी थी, दिन में मुश्किल से 5-6 घंटे बिजली मिल पाती थी| दिग्विजय ने शासन के दंभ में जनता की ओर ध्यान देना बंद कर दिया था| इस पर जनता ने उनकी सरकार को उखाड़ फेंका| मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमनसिंह ने प्रदेश के हर गांव में पक्की सड़कें, 24 घंटे बिजली जैसी सुविधाएं पहुंचाई यानी जनता की परेशानियों को काफी हद तक दूर कर दिया था|

अपने तीसरे शासनकाल में भी दोनों मुख्यमंत्रियों ने अपनी मद से जहां तक हो सका विकास कार्य करवाए, परंतु उनके विधायक निरंकुश हो गए| जनता की ओर ध्यान देने के बजाय वे अपनी जेबें भरने लगे| उन्हें गुमान हो गया था कि उन्हें कोई नहीं हटा सकता है| इस कारण वे अपने विधानसभा क्षेत्रों में भी इक्का-दुक्का ही दिखाई दिए| इसका खामियाजा उन्हें इस चुनाव प्रचार के दौरान भुगतना पड़ा| वे जब अपने क्षेत्रों में पहुंचे तो उन्हें जनता के आक्रोश का शिकार होना पड़ा| और यह गुस्सा चुनाव नतीजों में कांग्रेस की जीत के रूप में परिणीत हो गया| अर्थात जनता ही जनार्दन होती है| इस बारे में किसी ने क्या खूब कहा है कि:-

झुकाना सीखना पड़ता है सर लोगों के क़दमों में
यूं ही जम्हूरियत में हाथ सरदारी नहीं आती

-अंकुर उपाध्याय

प्रदेश के भावी मंत्रियों और स्पीकर के नाम पर सरगर्मी तेज़

नेता, जिनके नाम सीएम की दौड़ में, पढ़िए पूरी खबर…

राकेशसिंह ने दिया इस्तीफा

Share.