बेहतर प्रदर्शन करने वालों को मिले पदोन्नति

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आरक्षण…गतांक से आगे 

वर्तमान में सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में आरक्षण दिए जाने को लेकर बहस छिड़ी है| दरअसल, पदोन्नति में आरक्षण के बारे में बात करना ही बेमानी है क्योंकि इसका मतलब तो यही हुआ कि यदि आप आरक्षित कोटे से आते हैं तो कार्य के दौरान ख़राब प्रदर्शन करने के बाद भी आपकी पदोन्नति तय है| वहीं सामान्य वर्ग कितना भी बेहतर प्रदर्शन कर ले, उसका प्रमोशन आरक्षित कोटे के कर्मचारियों के बाद ही किया जाएगा|

पहले ही देश के सरकारी कार्यालयों की हालत रामभरोसे है| भ्रष्टाचार की दीमक संपूर्ण व्यवस्था को खोखला कर रही है| सरकारी कार्यालय में अपना काम निकालना रेगिस्तान से पानी निकालने जैसा दुरूह हो चुका है| यदि यह नियम लागू हो गया तो लोग पूरी तरह अकर्मण्य हो जाएंगे और इससे कार्य भी प्रभावित होगा| आरक्षित कोटे के कर्मचारी सोच लेंगे कि हमें काम करने की क्या ज़रूरत है, हम तो आरक्षण के माध्यम से पदोन्नत हो ही जाएंगे?

नियमानुसार प्रमोशन का आधार दफ्तर का कामकाज और जिम्मेदारी को ईमानदारी से पूरा करना है तथा दफ्तर को अपना अतिरिक्त समय और श्रम देना है, फिर यह प्रदर्शन कोई भी कर्मचारी करे इसके लिए वर्ग विशेष की बाध्यता नहीं होनी चाहिए| यदि प्रमोशन में आरक्षण का नियम लागू होता है तो ईमानदारी से कार्य करने के बावजूद सामान्य वर्ग वालों को पदोन्नति के लिए कतार में लगना होगा| जब उनके सामने उनसे कम काम करने वाला और उनका कनिष्ठ व्यक्ति पदोन्नत होगा तो वे हतोत्साहित होंगे|

यदि आरक्षित वर्ग वाला व्यक्ति कार्यालय में सबसे बेहतर कार्य करता है तो उसे पदोन्नति मिलना ही चाहिए, इस बारे में कोई दो मत नहीं है, परंतु औसत प्रदर्शन करने के बावजूद बेहतर कार्य करने वाले से पहले पदोन्नति मात्र आरक्षित कोटा होने के कारण की जाना सर्वथा अनुचित है|

सरकार के कार्मिक विभाग ने प्रमोशन में आरक्षण के मसले पर एम.नागराज बनाम केंद्र सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अमल में लाने के लिए बनाई रिपोर्ट पर सहमति जताई थी। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को समान अवसर और उनके समेकित विकास के लिए जरूरी है कि उनके लिए प्रमोशन में आरक्षण की सुविधा जारी रहे। मेरा मानना है कि यदि वे कार्य के दौरान अच्छा प्रदर्शन करेंगे तो उन्हें स्वतः ही उन्हें बेहतर अवसर मिलेंगे और मिल रहे हैं| आरक्षित कोटे के कई लगनशील और मेहनती लोग आज उच्च पदों को सुशोभित कर रहे हैं तो आखिर प्रमोशन में आरक्षण दिए जाने की क्या आवश्यकता है|

दरअसल, यह सब आरक्षित वर्ग के लोगों को अपने पक्ष में करने की राजनीतिक दलों और सत्तापक्ष की एक रणनीति के सिवाय और कुछ नहीं है| अध्ययन में आरक्षण हो, नियुक्ति में आरक्षण हो या पदोन्नति में आरक्षण हर क्षेत्र में एक ही तर्क है कि योग्यता के आधार पर व्यक्ति को अवसर प्रदान करने के बजाय जातिगत आधार पर चुनाव क्यों किया जाता है|

सरकार द्वारा विभिन्न विभागों में आए दिन भर्तियां निकाली जाती हैं, उनमें भी सामान्य वर्ग के लिए आवेदन-पत्र भरने का शुल्क अधिक होता है, जबकि आरक्षित कोटे वालों के लिए यह शुल्क नाममात्र या कभी-कभी माफ़ भी होता है| सवाल यही है कि क्या सामान्य वर्ग में निर्धन छात्र नहीं है क्या ? इस नियम से आरक्षित कोटे वालों को धनवान होते हुए भी शुल्क माफ़ हो जाता है वहीं एक निर्धन सामान्य वर्ग वाले को भी अधिक शुल्क भरना पड़ता है| आखिर यह कैसी व्यवस्था है ?

प्रमोशन में आरक्षण के मसले पर संसद में हुई चर्चाओं में यह बात सामने आई है कि केंद्र सरकार में नौकरशाही के सबसे महत्वपूर्ण पद सचिव पर एक भी दलित नहीं है। डायरेक्टर के पद पर भी चंद दलित ही हैं। इसका प्रमुख कारण यही है कि आरक्षण के माध्यम से कम प्रतिशत होने के बावजूद परीक्षाएं पास करने वालों का जब नौकरी के दौरान हकीकत से सामना होता है तो वे कार्य को बेहतर ढंग से नहीं कर पाते हैं इस कारण उनका प्रमोशन नहीं हो पाता है वहीं अच्छे प्रतिशत से उत्तीर्ण होने वाले कार्य बेहतर ढंग से करना जानते हैं और उच्च पद हासिल कर लेते  हैं चाहे वे सामान्य वर्ग से हो या आरक्षित वर्ग से| ऐसे कई चिकित्सकों के बारे में हमने सुना है, जो आरक्षण के माध्यम से डिग्री तो हासिल कर लेते हैं परंतु कार्य क्षेत्र में वे कई मरीजों के मामले बिगाड़ देते हैं| वहीं अध्ययन कर अच्छे नंबर हासिल करने वालों को विषय का पूरा ज्ञान होता है, जिससे वे कार्यक्षेत्र में भी बेहतर प्रदर्शन करते हैं और पदोन्नति भी हासिल करते हैं|

दरअसल, राजनीतिक मसनदों पर बैठे राजनीतिज्ञों को इन तर्कों से कोई मतलब नहीं है उनका मकसद तो  आरक्षण के माध्यम से सिर्फ वोट बटोरना है, फिर सामान्य वर्ग की चाहे जो दशा हो|

-अंकुर उपाध्याय

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