दवाइयों के दाम बांधोः कुछ और भी…

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भारत सरकार दवाइयों के मामले में अब एक ऐसी पहल करने जा रही है, जिससे करोड़ों भारतीयों को सीधा लाभ पहुंचेगा। अभी तक उसने 850 तरह की दवाइयों की कीमतों पर अंकुश लगाया था। अब वह लगभग 2500 तरह की  अन्य दवाइयों की कीमतों पर काबू करेगी। आज देश में दवाइयों का बाज़ार 1 लाख करोड़ रु. का है। इसमें शक नहीं कि भारत में बननेवाली दवाइयां पश्चिमी देशों के मुकाबले काफी सस्ती हैं, लेकिन यह भी सत्य है कि दवाइयां इस देश में लूटपाट के सबसे बड़े साधनों में से एक है। दवाइयों में मुनाफे की कोई सीमा नहीं है। कंपनियां जो भी कीमत रख दें, मरीजों को झक मारकर वे खरीदनी पड़ती हैं। वहां कोई भावताव नहीं चलता। मरता क्या नहीं करता ? हजारों रु. की एक खुराक और लाखों रु. का एक इंजेक्शन भी खरीदना पड़ता है। निजी अस्पताल तो मरीजों की खाल उधेड़ लेते हैं।

अब नीति-आयोग ने दवाइयों और चिकित्सा उपकरणों की कीमतें तय करने के लिए एक कसौटी तैयार की है। इसी आधार पर हर साल दवाइयों की कीमतें तय होंगी। उनमें हर साल 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो सकती है। नीति आयोग को इस शुभ-कार्य के लिए मैं बधाई दूंगा, लेकिन देश के करोड़ों गरीब, ग्रामीण, पिछड़े और वंचित लोगों के स्वास्थ्य की यदि हम ठीक देखभाल करना चाहते हैं तो सरकार को कई अन्य कठोर कदम भी उठाने होंगे। सबसे पहले तो डॉक्टरों की संख्या बढ़ानी होगी। इसके लिए अंग्रेजी में चलनेवाली मेडिकल की पढ़ाई बंद करनी होगी। इस पढ़ाई को सस्ता भी करना होगा। यदि डॉक्टरी की पढ़ाई भारतीय भाषाओं में हो और उसके प्रवेश में से भ्रष्टाचार हट जाए तो गांव-गांव में करोड़ों लोगों को डॉक्टरी सेवाएं उपलब्ध हो सकती हैं।

दूसरा, सिर्फ दवाइयों के ही नहीं, अस्पतालों द्वारा दी जाने वाली हर चीज और हर सेवा के दाम बांधे जाने चाहिए। तीसरा, देश के राष्ट्रपति से लेकर चपरासी तक सरकार, संसद और न्यायपालिका से जुड़े हर नागरिक और उसके परिजन का इलाज अनिवार्य रूप से सरकारी अस्पतालों में होना चाहिए। अत्यंत विशेष परिस्थिति में ही गैर-सरकार इलाज की अनुमति दी जा सकती है। चौथा, यदि किसानों को उनकी फसल की लागत का डेढ़ा दाम देना ठीक है तो यही गुर दवा निर्माता कंपनियों पर लागू क्यों नहीं किया जाए? पांचवां, देश के अस्पतालों और दवा-निर्माताओं और विक्रेताओं को प्रेरित किया जाए कि खुद को वे अमरीका और यूरोप की नकल पर न ढालें। सादगी रखें। छठा, देश में आयुर्वेदिक, यूनानी, होम्योपैथी, प्राकृतिक चिकित्सा और रेकी जैसी पद्धतियों को भी प्रोत्साहित किया जाए। सातवां, देश की सभी पाठशालाओं में खानपान, आसन, प्राणायाम, व्यायाम और प्रारंभिक चिकित्सा का एक अनिवार्य पाठ्यक्रम रखा जाए ताकि बड़े होने पर लोगों को अस्पतालों की शरण न लेनी पड़े।

– डॉ.वेदप्रताप वैदिक

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं)

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