पार्टियों में दलबदलुओं का दौर

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चुनाव नज़दीक आते ही नेता कपड़े की तरह पार्टियां बदल देते हैं। प्रत्येक चुनाव में बागी नेताओं की संख्या अच्छी खासी होती है। यह एक लाइलाज़ बीमारी है, जिससे कोई भी पार्टी अछूती नहीं है। यह भी सही है कि दलबदलुओं में कुछ ऐसे नेता होते हैं, जिनका वास्तव में हक मारा जाता है। ऐसे में जब वे मैदान में निर्दलीय के तौर पर उतरते हैं तो पार्टी पीछे छोड़ देते हैं। ऐसे में कई नेता निर्दलीय तौर पर जीत भी जाते हैं। इनमें ज्यादातर वही नेता होते हैं, जो पार्टी के वोटबैंक के सहारे चुनावी मैदान में उतरते हैं। मध्यप्रदेश में पिछले कई चुनावों में पार्टी से बगावत कर मैदान में उतरने वालों की संख्या काफी थी, लेकिन उनमें जीत का स्वाद कम ही चख पाए। कई नेताओं की जमानत भी जब्त हो गई।

ऐसा नहीं है कि टिकट नहीं मिलने पर नेताओं के बागी रूप सामने आते हैं बल्कि कई दिग्गज नेता भी इसे बढ़ावा देते हैं। इसके अलावा तीसरा मोर्चा पार्टी की हार-जीत का पूरा गणित ही पार्टी बदलने वाले ताकतवर नेताओं पर निर्भर करता है। भाजपा ने 2001 में कई नेताओं को दलबदल करवाकर अपनी पार्टी में शामिल किया था। 1998 में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह ने बसपा के विधायकों को तोड़कर कांग्रेस में शामिल करवाया था। हर नेता यही चाहता है कि उनकी पार्टी का कोई नेता पार्टी नहीं छोड़े, लेकिन दूसरे दलों के नेताओं को तोड़ने का कार्य वे खुद करते हैं।

दिग्गजों ने बदला दल

प्रदेश में 2008 के विधानसभा चुनाव में कई दिग्गज नेताओं ने टिकट नहीं मिलने पर निर्दलीय लड़ने का फैसला किया। इनमें से मात्र 4 नेता ही चुनाव जीत पाए। संजय शाह (टिमरनी) भाजपा और मानवेंद्र सिंह (महाराजपुर) ने कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने पर निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीत दर्ज कर ली। विक्रम सिंह नातीराजा (राजनगर) ने सपा छोड़ कांग्रेस का दामन थामा और प्रेमनारायण ठाकुर (अमरवाड़ा) ने कांग्रेस छोड़ भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़ा। दोनों ही चुनाव जीतने में सफल हुए थे। वहीं मुकेश नायक (पवई), चंद्रभानसिंह (दमोह), मानिकसिंह (धौहनी), रसालसिंह (सेवढ़ा), शंकर प्रताप सिंह (राजनगर), जालमसिंह पटेल (नरसिंहपुर) और हरिवल्लभ शुक्ला (पोहरी) ने बागी होकर चुनाव लड़ा और हार गए।

सभी बागी जीते

साल 2003 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की लहर ऐसी चली कि 9 बागी नेता चुनाव जीतने में सफल रहे थे। इनमें एक को छोड़कर सभी कांग्रेस के थे। इनमें से सिर्फ एक कमलापति आर्य ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा से चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की बाकी कांग्रेस छोड़कर अन्य दलों में चुनाव लड़ा, उनमें अर्जुन पलिया (पिपरिया), दिलीपसिंह गुर्जर (खाचरौद), वंशमणि प्रसार वर्मा (सिंगरौली), हर्षसिंह (रामपुर बघेलान), हरिवल्लभ शुक्ला (पोहरी) और हामिद काजी (बुरहानपुर) थे। वहीं सोबरन सिंह ने पाटन में जनता दल छोड़कर कांग्रेस से चुनाव लड़ा और जीत गए।

बागी का हश्र

उम्मीदवार –  सीट  पुराना दलनया दल –  नतीजा

मानवेंद्र सिंह –  महाराजपुर – कांग्रेस – निर्दलीय – जीत

संजय शाह – टिमरनी – भाजपा – निर्दलीय – जीत

दिव्यराज सिंह – सिरमौर – कांग्रेस – भाजपा – जीत

नारायण त्रिपाठी – मैहर – कांग्रेस – भाजपा – जीत

संजय पाठक – विजय राघवगढ़ – कांग्रेस- भाजपा – जीत

विक्रम सिंह – राजनगर – सपा – कांग्रेस – जीत

प्रेमनारायण ठाकुर – अमरवाड़ा – कांग्रेस – भाजपा- जीत

मानिक सिंह – धौहनी – भाजपा – सपा – हार

मुकेश नायक – पवई – कांग्रेस – भाजपा – हार

चंद्रभान सिंह – दमोह – भाजाप – कांग्रेस – हार

बालेंदु शुक्ल – ग्वालियर दक्षिण – कांग्रेस – बसपा – हार

रसाल सिंह – सेवढ़ा – भाजपा – कांग्रेस – हार

शंकर प्रताप सिंह – राजनगर – कांग्रेस – बसपा – हार

केके सिंह – सीधी – सपा – कांग्रेस – हार

वंशमणि प्रसाद वर्मा – देवसर – सपा – कांग्रेस – हार

सोनराम कुशवाहा – जौरा – बसपा –  रासद – हार

प्रेम शंकर उइके – जुन्नारदेव – कांग्रेस – सपा – हार

हर्ष सिंह – रामपुर – रासद – भाजपा – हार

नाथूलाल कामराज – मंदसौर – कांग्रेस – बसपा – हार

संजीव सक्सेना – भोपाल दक्षिण-पश्चिम – बसपा – कांग्रेस – हार

सुरेंद्र सिंह सिसौदिया – बड़नगर – कांग्रेस  – निर्दलीय – हार

घनश्याम पाटीदार – जावद – कांग्रेस  – निर्दलीय – हार

भागीरथ पाटीदार – हुजूर – भाजपा  – निर्दलीय – हार

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