पीएम मोदी का सर्वश्रेष्ठ भाषण

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से अब तक जितने भी भाषण दिए हैं, उनमें आज का भाषण सर्वश्रेष्ठ रहा, हालांकि उसमें कुछ जरुरी बातें और भी होनी चाहिए थीं। इस भाषण की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि यह विपक्ष या भाजपा के नेता की तरह नहीं, बल्कि देश के नेता की तरह दिया गया।

इसमें न तो पिछली सरकारों की टांग-खिंचाई की गई और न ही किसी बाहरी देश पर गोले बरसाए गए। इमरान खान ने ‘मोडी’ और आरएसएस का नाम ले-लेकर कल पाकिस्तान-दिवस पर क्या-क्या नहीं कहा लेकिन मोदी ने सिर्फ धारा 370 और 35 ए को हटाने के फायदे गिनाए।

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उन्होंने तीन तलाक को तलाक देने के क्रांतिकारी कदम का जिक्र किया। जीएसटी याने ‘एक देश और एक कर’ की बात कही। उन्होंने पांच खरब की अर्थ-व्यवस्था का सपना दिखाया और भाारतीय सेना में अब तीनों शाखाओं पर एक सर्वोच्च सेनापति नियुक्त करने की घोषणा की। यह सब तो ठीक है लेकिन इस भाषण में मुझे लगा कि एक नए मोदी का जन्म हुआ है। भारत के प्रधानमंत्री की जो भूमिका मैं वरैण्य मानता हूं, उसे निभाने का संकल्प मुझे मोदी में दिखा।

किसी प्रधानमंत्री ने लाल किले से पहली बार जनता को इतना सक्रिय करने का आह्वान किया। प्रधानमंत्री की कुर्सी में बैठने के बाद नेता लोग नौकरशाही और अपनी पार्टी के दम पर देश को चलाने का दम भरते हैं लेकिन किसी समाज-सेवक की तरह जनता को सक्रिय करने का प्रयत्न नहीं करते।

इमरान के पास नहीं कोई विकल्प

मोदी ने प्लास्टिक थैलियों को छोड़ने, रासायनिक खाद से बचने, जनसंख्या-नियंत्रण और पर्यटन बढ़ाने के लिए जैसी प्रेरणादायक अपील सर्वसाधारण से की है, वह उनके सच्चे नेता बनने का परिचायक है। यदि इसमें वे रिश्वत और दहेज लेने और देने के बहिष्कार की बात भी जोड़ देते तो देश का बड़ा कल्याण होता। वे देश के करोड़ों लोगों को रोजाना आसन, प्राणायाम और व्यायाम के लिए भी प्रेरित कर सकते थे।

ये वे काम हैं, जो प्रधानमंत्री पद छोड़ देने के बाद भी उन्हें भारत के लोगों के दिलों में जिंदा रख सकते हैं। उन्होंने पांच खरब रु. की अर्थ व्यवस्था का सपना जरुर दिखाया लेकिन यह नहीं बताया कि उसे वे करेंगे कैसे ? मान लें कि वह पांच की बजाय दस खरब की हो गई तो भी क्या होगा ? यदि देश में गैर-बराबरी, बेरोजगारी, गरीबी, गंदगी, सांप्रदायिक और जातीय हिंसा नहीं घटी तो उस दस खरब रु. का हम क्या करेंगे ?

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 -डॉ. वेदप्रताप वैदिक                         

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं )

 

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