मुल्ला की मौत: अमेरीकी पैंतरा

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पाकिस्तान के तहरीके-तालिबान का सरगना मुल्ला फजलुल्लाह मारा गया, यह खबर हमारे लिए जितनी खुश-खबर है, उससे ज्यादा पाकिस्तान के लिए है। अफगानिस्तान के लिए भी है और अमेरिका के लिए तो है ही, क्योंकि उसकी फौज ने ही इस खूनी मुल्ला को ड्रोन हमले में मार गिराया है। इस खूनी दरिंदे को ‘मुल्ला रेडियो’ के नाम से भी जाना जाता था, क्योंकि इसने अपना एक रेडियो चेनल खोल रखा था, जिस पर यह रोज़ जहर उगला करता था। यह वही मुल्ला है, जिसने नोबेल पुरस्कार विजेता मलाला की हत्या करवाने की कोशिश की थी। इसी मुल्ला के हाथ रंगे हुए हैं, उन डेढ़ सौ पाकिस्तानी बच्चों के खून से, जो पेशावर के सैनिक स्कूल में पढ़ रहे थे।

इसी की नापाक हरकतों का नतीजा था कि 2014 में पाकिस्तान की फौज ने आतंकवादियों की हड्डियां तोड़ देने का बीड़ा उठाया था। पाकिस्तान की स्वात घाटी में इसका मुख्यालय था लेकिन यह पाक-अफगान सीमांत के जंगलों में छिपता-छिपाता आतंकी कार्रवाई करता रहता था। इसके गिरोह के आतंकियों ने पाकिस्तान और अफगानिस्तान के लोगों को बहुत बेरहमी से मारा था। अफगानिस्तान में जमी अमेरिकी फौज के कई सैनिकों को भी उन्होंने मौत के घाट उतार दिया था। अमेरिका ने फजलुल्लाह के सिर पर 50 लाख डाॅलर का इनाम भी रखा हुआ था। फजलुल्लाह अमेरिका के हाथों उसी तरह मारा गया, जैसे उसामा बिन लादेन मारा गया था। फजलुल्लाह और उसामा को ही अमेरिका ने क्यों मारा ? जो अन्य आतंकवादी गिरोह पाकिस्तानी पंजाब और कश्मीर में सक्रिय हैं, उनके खिलाफ अमेरिका कोई कार्रवाई क्यों नहीं करता ? इसीलिए नहीं करता कि ये आतंकवादी भारत को नुकसान पहुंचाते हैं।

अमेरिका को नहीं। भारत के खातिर अमेरिका कोई खतरा क्यों मोल ले? अमेरिका विश्व-आतंकवाद से लड़ने का नाटक भर करता है। उसका एक मात्र लक्ष्य अपने राष्ट्रहितों की रक्षा करना है। अमेरिका की कृपा बनी रहे, इसीलिए पाकिस्तान उसके राष्ट्रहितों की रक्षा में उसका सहायक बन जाता है। फजलुल्लाह के मारे जाने से पाकिस्तान को भी राहत मिलेगी। अब शायद तालिबान के सभी फिरके महाशक्तियों के संवाद में शामिल होने के लिए तैयार हो जाएं।

– डॉ. वेदप्रताप वैदिक

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं)

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