लहू का सस्तापन है या इंसानियत की महंगाई?

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टोपी पहन कर गाय को मत देखों ज़नाब, मारे जाओगे! भगुआ पहना है तो मस्ज़िद वाली गली से भी न गुजरना, मारे जाओगे! धर्म के ढेकेदारों की नज़र उनकी तलवार से तेज़ है| जुर्म भी सड़क पर, कानून भी सड़क पर, सजा और माफ़ी का फैसला भी सड़क पर! इन्साफ का तराजू हाथ में और अपनी मर्जी के कानून से देश की किस्मत लिख देने की होड़ ही है, आज का भारत, बदलता भारत, रोशन भारत, आगे बढ़ता भारत, विश्व गुरु भारत |

मतभेद तो ज़रूर रहेगा, लेकिन मनभेद नहीं होगा

हर बात को धर्म और फिर धर्म को सियासत से जोड़कर देश को चलाने और आगे बढ़ाने के दावों के बीच हिंसा और उसमे मरने वालों के परिवार सिर्फ आँसू के हक़दार है| इससे ज्यादा उन्हें कुछ हासिल नहीं होगा | हासिल होगा उन्हें, जो मरने के बाद उसके किरदार को तब तक जिन्दा रखेंगे जब तक उल्लू सीधा न हो जाये|

सियासत की बात न भी करें, तो क्या संवेदनाये इतनी शून्य हो गई है कि लहू बहाने से पहले, जान लेने से पहले एक बार भी मन नहीं पसीजता ? कौन है हम? राक्षस, आदमखोर, आतंकी, डाकू या पेशेवर कातिल ? आम जनता इतनी घातक की लात और घूसों से ही किसी की जान ले ले ? यकीं नहीं होता ? जिस भारत में प्रेम की गंगा बहती है, वहां लहू के दरिया कहां से आये, कैसे आये, कौन लाया ?

फिर भी भारत को अमेरिका से सावधान रहना होगा

कहते है सब सियासत का कीया- धरा है? तो क्या हमारी सोचने समझने की शक्ति इतनी क्षीण हो गई है कि लहू कि लाल रंग की भयावहता समझ नहीं आ रही | गीता और कुरान दोनों में से किसी ने हिंसा का पथ नहीं दिखाया गया है| सुना ही होगा मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना ! क्या ये ग्रन्थ झूठे है या हम ज्यादा समझदार हो गए है? क्या धार्मिक भावनाएं अब चरम पर है और धर्म की रक्षा की अक्ल अब एक दम से आ गई है?

पहले धर्म नहीं था या उसके मानने वाले नहीं थे? सच तो यह है कि पहले धर्म का धंधा नहीं था और न थे उसके ठेकेदार ! मोब लिंचिंग धार्मिक कटटरता का सबसे बुरा रूप है| विरोधाभास यह की धर्म की रक्षा के लिए अधर्म का रास्ता और वो भी किसी की हत्या कर देने तक| जिस गाय के लिए किसी को मार दिया जा रहा है, वह दूध देने के बाद किसी से नहीं पूछती की पिने वाले का मजहब क्या है?

जनता से कौन जुड़ा हुआ है ?

अल्लाह ने शायद कभी नहीं कहां होगा कि इस्लाम की रक्षा में हिन्दू का लहू बहाना जरुरी है! न राम ने कभी कहां की मुझे भगुआ पसंद है और न पैगम्बर साहब ने हरे रंग का मज़हब बताया है| वरना राम के नाम पर लाठी उठाने वाले अपनी कुलदेवी को हरी चूड़ियाँ न चढ़ाये और न ही हरी सब्जी खाये, वहीं अल्लाह को खुश करने के लिए रोज़े रखने वाले इफ़्तारी में केसरिया भात और संतरे को शामिल न करें |

सच तो यह है कि शायद नर्क कहीं है ही नहीं| हम सब मिलकर अल्लाह और ईश्वर के नाम पर, हरा और नारंगी के भेद में इस खूबसूरत जहान को, हिंदुस्तान को ही नर्क बना लेंगे, क्योंकि हम में से कोई भी इन कर्मो के साथ स्वर्ग या जन्नत के काबिल है ही नहीं…..

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