नज़्मों के बादशाह ग़ालिब की नई दुनिया

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प्यार और दर्द से भरी नज़्मों के बादशाह ग़ालिब के कई शेर (Mirza Ghalib 221st Birth Anniversary) आज भी उनकी यादों को ताज़ा कर देते हैं|

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी, के हर ख़्वाहिश पे दम निकले,

बहुत निकले मेरे अरमां, लेकिन फिर भी कम निकले…

शेरो-शायरी की दुनिया में उर्दू के सबसे मशहूर शायर ग़ालिब जैसा शायद आज तक कोई दूसरा नहीं हुआ| बड़े से बड़ा शायर भी उनका मुरीद है| लगभग 200 साल बाद (Mirza Ghalib 221st Birth Anniversary) आज भी उनकी नज़्में लोगों की जुबां पर आ ही जाती हैं| बड़े-बड़े शायर भी उनकी शायरी के आगे नतमस्तक होकर और उनके नक्शे कदम पर चलकर मशहूर हुए हैं|

हम वहां हैं जहां से हम को भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती..

उर्दू के सबसे मशहूर शायर मिर्ज़ा ग़ालिब की आज 221वीं जयंती है| वे एक ऐसी शख्सियत थे, जिन्होंने इस परंपरावादी दुनिया की सारी सीमाओं को तोड़कर जज़्बात के बवंडर से निकलकर दुनिया को अपने रंग में रंग दिया, जिसका रंग आज तक नहीं उतरा|

शहादत थी मिरी किस्मत में, जो दी थी यह खूं मुझको

जहां तलवार को देखा, झुका देता था गर्दन को…

ग़ालिब का बचपन (Mirza Ghalib 221st Birth Anniversary) बड़े ही आराम से गुज़रा था| उनका जन्म 27 दिसंबर 1717  को आगरा के काला महल में हुआ था| उनका नाम मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां उर्फ ‘ग़ालिब’ था| वे पहले आगरा में ही रहते थे, लेकिन अपने पिता और चाचा की मृत्यु के बाद वे दिल्ली में बस गए| केवल 13 साल की उम्र में उनका निकाह नवाब इलाही बख्श खान की बेटी उमराव बेगम से हुआ था| उनके सात बच्चे हुए, लेकिन कोई भी जीवित नहीं रह पाया| उन्हें ज़िंदगी में हर चीज़ का तज़ुर्बा हुआ, पर वह हमेशा अधूरी ही रही| वे बचपन से ही अनियंत्रित और  स्वच्छंद स्वभाव के थे| उनकी शायरी में उनके दर्द का कतरा घुला मिलता है|

दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है,

आख़िर इस दर्द की दवा क्या है…

‘इश्क़ ने ‘ग़ालिब’ निकम्मा कर दिया, वरना हम भी आदमी थे काम के’ जैसे उनके कई शेरों को आज तक भुलाया नहीं जा सका है |

ग़ालिब को फारसी में महारत हासिल थी| उनमें ऐसा आत्मसम्मान था कि जब उनकी माली हालत ठीक नहीं थी, तब भी उन्होंने अपने स्वाभिमान का सौदा नहीं किया| एक दफा उन्हें दिल्ली के एक कॉलेज में फ़ारसी की तालीम देने के लिए बुलाया गया था| वे जब वहां पहुंचे तो उनके इस्तकबाल के लिए कोई हाज़िर नहीं हुआ, इस बात से वे यू ख़फ़ा हुए कि वे प्रवेश द्वार के अंदर ही नहीं गए| इस बारे में उन्होंने कहा था कि साहब मेरे स्वागत के लिए बाहर नहीं आए इसलिए मैं भी अंदर नहीं जाऊंगा| मैंने यह नौकरी इसलिए करनी चाही क्योंकि मैं अपने खानदान की इज्ज़त बढ़ाना चाहता था न कि इसलिए कि इसमें कमी आ जाए|

नादान हो जो कहते हो क्यों जीते हैं ‘ग़ालिब’
किस्मत मैं है मरने की तमन्ना कोई दिन और…

आधा मुसलमान हूं

एक दफ़ा जब ग़ालिब को अंग्रेजों ने पकड़ लिया और उन्हें सार्जेंट के सामने पेश किया गया, तब उनका वेश देखकर उनसे पूछा गया, क्या तुम मुसलमान हो? ग़ालिब ने जवाब दिया कि मुसलमान हूं पर आधा, शराब पीता हूं, सूअर नहीं खाता| ग़ालिब ने अपने कई नग़मों से लोगों को दुनिया की सच्चाई बताई|

था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता तो खुदा होता,

डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता..

ग़ालिब की वफ़ात भले ही 15 फरवरी, 1869 को हो गई हो, लेकिन उनकी शायरी और उनका नाम आज भी ज़िंदा है| उनकी शायरियों से आज भी आशिकों का दिल छलनी हो जाता है| उनकी नज़्में एक नई दुनिया से परिचय करवाती है| आइए जानते हैं उनकी कुछ सदाबहार नज़्मों के शेर..

हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है…

फिर उसी बेवफा पे मरते हैं 
फिर वही ज़िन्दगी हमारी है 
बेखुदी बेसबब नहीं ‘ग़ालिब’
कुछ तो है जिस की पर्दादारी है…

 बे-वजह नहीं रोता इश्क़ में कोई ग़ालिब 
जिसे खुद से बढ़कर चाहो वो रूलाता ज़रूर है..

हाथों की लकीरों पे मत जा ऐ गालिब 
नसीब उनके भी होते हैं, जिनके हाथ नहीं होते…

मिर्ज़ा ग़ालिब के फ़िल्मों में उपयोग किए गीत

https://www.youtube.com/watch?v=_BJcfx8EiDY

लोगों के दिलों में बसते हैं बाबा आमटे

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