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Controversial Statements : नेताओ की फिसलती ज़ुबान

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कल एक पारिवारिक मित्र के घर भोजन का आमंत्रण था वहा गए हम वार्तालाप कर रहे थे की तभी अचानक अंदर से मित्र के बेटे के चीखने-चिल्लाने माफ़ कर दो – माफ़ कर दो की पुकार गूंजने लगी देखा तो मित्र की पत्नी ने ही सुपुत्र साहब की कुटाई समारोह का आयोजन किया था खैर हमने औपचारिकता  निभाते हुए बीचबचाव किया और कुटे -पिटे सुपुत्र को लेकर बाहर आये, उत्सुकता यह थी की आखिर माज़रा क्या हैं पूछने पर पता चला की बेटे के श्री मुख से कुत्ते,कमीने जैसे अपशब्दों का प्रयोग हुआ था जिस कारण उनके कुटवाड़े उड़ गए | माता जी का  बोलना था कि अभी से नहीं रोका तो आगे चलकर और भी बुरा बोलने लगेगा | माताजी के ये शब्द मेरे कानो में एसिड की बूंदो (Politicians Controversial Statement ) की तरह गिरे और मेरी आँखों के सामने राहुल गाँधी, दाती  महाराज, आज़म खान , मायावती, लखन घनघोरिया जैसे नेता घूमने लगे और इनके बोले हुए शब्द कि चौकीदार चोर हैं – अली और बजरंगबली-  श्राप दे दूंगा – मोदी लिपिस्टिक लगते हैं – अंडरवियर खाकी रंग का है ये बयान भी गूंजने लगे । मैं ये सोचने लगा कि ये सब बोलने वालो को, क्या शब्दों के चयन की कभी कोई शिक्षा नहीं दी गई क्या देश की जिम्मेदारी सम्हालने वालो के लिए ज़ुबान पर लगाम लगा के रखना क्या निहायत ज़रूरी नहीं हैं क्या चुनाव का टिकट देते समय धनबल, बाहुबल के साथ अक्ल को महत्तव नहीं दिया जाना चाहिए |

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द्रोपदी ने एक लाइन ही तो बोली थी कि अंधे का पुत्र अँधा होता हैं और कितनी बड़ी महाभारत हो गई 56 करोड़ लोगो की जान चली गई क्या इतने भीषण नरसंहार को देखने के बावजूद भारत की धरती पर पैदा होने वाले सत्ता को पाने के लिए शब्दों के चीर हरण से पीछे नहीं हटते | संविधान हमे अपने विचार व्यक्त करने की आज़ादी देता हैं लेकिन आज़ादी के नाम पर वैचारिक नंगापन क्या उचित हैं वो भी वो लोग जिन्हे देश सुनता हैं राहुल हो या आज़म, बीजेपी हो या कांग्रेस खुद को सही और दूसरे को गलत साबित करने की धुन में ज़ुबान को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं या शब्दों का बलात्कार कर रहे हैं |

ये आपको और हमे मिलकर सोचने की ज़रूरत हैं कि जो सत्ता पाने के लिए शब्दों की मर्यादा भूल रहे हैं वो सत्ता पाने के बाद पद की मर्यादा का ध्यान रखेंगे इस बात की ज़मानत कौन देगा |  EVM पर बटन दबाने से पहले एक बार मेरी बात पर ज़रूर गौर कीजियेगा |

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