Lok Sabha Election 2019 : इस बार मामला अलग है

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लोकसभा चुनाव 2019 (Lok Sabha Election 2019) का आधिकारिक बिगुल कभी भी फूंका जा सकता है| मगर सियासी दल अपनी तैयारियों को लेकर संजीदा हो चुके है या यूँ कहे कि इंतजामात चरम पर है | बात दलों की तैयारियों की करे तो इन में सबसे आगे बीजेपी ही है | 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत से जीत दर्ज कर कीर्तिमान रचने के साथ सत्ता में आई बीजेपी ने इस जीत का जश्न अगले चार साल तक मनाया | चुनाव के बाद भी हर मंच से से विपक्ष की नाकामयाबी गिनवाने का सिलसिला थमा नहीं | सत्तर साल बनाम चार साल को हर भाषण में प्रयोग करने के आदेश का पालन बीजेपी के हर नेता ने बड़ी शिद्दत से किया | जिसका फायदा भी पार्टी को हुआ | ऊपर से बीजेपी का मजबूत सोशल मीडिया तंत्र लोगों को यह बताने में कामयाब रहा की कांग्रेस ने कितने समय राज किया| यह वह रणनीति थी जिसने बीजेपी को सदा इस दौड़ में दूसरों से आगे रखा हैं |

लगभग साढ़े चार साल तक माहौल एकतरफा बनाये रखने में कामयाब रही बीजेपी अचानक से चिंतित लग रही है | जब तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में एक के बाद एक बीजेपी को पराजय मिली तो जड़े जरा ढीली पड़ने लगी है | लगातार जीत के बाद एक अदद हार मनोबल तोड़ देती है | मगर हार पर हार हड़कंप मचा देती है | यह बात आस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम से लेकर बीजेपी जैसी सियासी पार्टी तक लागु होती है | अंदरूनी सूत्रों की माने तो अचानक से एक नाम की गूंज जो सिरमौर बन गई थी, बदली फ़िजा में अब कानों को चुभने लगी है | अंदरूनी कलह, एक अजीब सा दबाव, सिर उठाते सहयोगी, सांसदों-विधायकों की दबंगई के किस्से, और मनमानी के चलते रायशुमारी से परहेज ताबूत की कील में तब्दील हो सकते है| यहाँ यह कहना आवश्यक होगा की इसमें विपक्ष की कोई गलती नहीं है | जहा धुआँ है वहा आग तो होगी | तभी तो जो लोग गूगल पर पप्पू सर्च करने के परिणाम से वाकिफ है, वो इसी सर्च इंजन पर फेंकू के बाद डिस्प्ले होने वाली इमेज को भी भलीभांति जानते है | आखिर ऐसा क्या हुआ| शायद कथनी और करनी का फर्क जनता समझ गई | या जान गई की ज़ोर से कही गई हर बात सत्य नहीं होती | बहरहाल अब हालात 2014 जैसे तो कतई नहीं है | क्लीन स्वीप मुश्किल है | परिश्रम होगा | मामला जरा अलग है| कुछ भी संभव है | 

सिक्के का दूसरा पहलु मतलब समूचा विपक्ष | या इसे महागठबंधन भी कहा जा सकता है | आजकल वही चलन में है | अब यह गांठ कितनी पक्की है और कितनी गांठे इसमें लगाई जाएगी, कब तक रहेगी या कैसे खुलेगी यह आने वाला वक़्त ही बताएगा | देश की सबसे पुरानी पार्टी फ़िलहाल आईसीयू से तो बाहर आ गई है | मगर उसकी सुधरी तबियत पर अन्य किसी पार्टी को को एतबार नहीं है| कारण खुद ही है और इसकी रिकवरी जारी है | खोये विश्वास ने दूसरों को पास आने का मौका दिया है | इन सब के बीच समूचे विपक्ष के लिए एक ही खुश होने की वजह है कि वह हवा का रुख मोड़ने में फिलहाल कामयाब हो गया है| पर खुशफहमी की जरुरत नहीं है | जनता भी जरा जागरूक सी लग रही है | उसकी कसौटियां जरा सख्त हो चली है | सब शिक्षा का किया धरा है | अभी लम्बा सफर बाकि है और बाकि है सफर का सबसे कठिन दौर | क्योकि अपनी ही गलती से दिल्ली 2014 में दूर हुई थी, फ़िलहाल दूर है और 2019 में की गई एक गलती से फिर दूर रह सकती है |

अभिषेक

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