कॉमन मैन !

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शपथविधि संपन्न हुए चार दिन हो गए, लग ही नहीं रहा है कि मप्र में कमलनाथ सीएम हो गए हैं। मप्र के प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के इतिहास में ऐसा सूखा पहले कभी नहीं देखा…! प्रदेश में कॉमन मैन ने कांग्रेस को सत्ता सौंपी और अगले ही दिन शिवराज ने नीली चिड़िया पर खुद को पहले एक्स सीएम और थोड़ी देर बाद कॉमन मैन घोषित कर दिया था, जैसे सत्ता सौंपने वालों में से वे भी एक कॉमन मैन हो गए। देखा जाए तो शिवराज ने मप्र का खजाना खाली करके एक तरह से कमलनाथ के हाथ बांध दिए हैं और यही वजह है कि शिवराज से अधिक कॉमनमैन तो सीएम नज़र आ रहे हैं।

कांग्रेस ने जिस कंगाली में चुनाव लड़ा, वह तो एक चार के विज्ञापन से ही समझ आ गया था, कहां भाजपा के हर दिन एक-दो पेज और कहां ऊंट के मुंह में ज़ीरा जैसे कांग्रेस के सौ सेमी के विज्ञापन । तब भी यही प्रचारित हुआ था कि कमलनाथ के हाथ में प्रदेश कांग्रेस की कमान है तो यह सारी व्यवस्था भी हो रही है, सिंधिया होते तो विज्ञापन की हालत और खराब होती। क्या वह नोटबंदी को लेकर कांग्रेस की स्ट्रेटेजी थी आम मतदाताओं का यह विश्वास मजबूत करना कि चुनाव प्रचार के मामले में भाजपा करोड़ों खर्च सकती है और कांग्रेस फूटी कौड़ी भी नहीं।

शपथ ले ली, सरकार के मुखिया हो गए, लेकिन अब तक कॉमन मैन वाले खोल से बाहर ही नहीं आ पा रहे हैं कमलनाथ। पंद्रह साल के भाजपा शासन-खासकर शिवराज की सत्ता वाले वर्षों-से भी कुछ नहीं सीखा कमलनाथ ने। सीखते भी कैसे मप्र से वास्ता ही कहां रहा, उन्होंने हर घोषणा को राज्योत्सव जैसे इवेंट में तब्दील होते देखा ही कहां । यदि कमलनाथ ने कॉमन मैन वाला दुशाला ओढ़ रखा है तो सीएम रहने तक इसे उतारना भी नहीं चाहिए। मैंने तो जंबूरी मैदान में शपथ वाले सीएम का ऐसा फीकाफस शपथ समारोह पहले कभी नहीं देखा। जलसा कहना तो इस शब्द का अपमान होगा। न पानी का इंतजाम,  न बैठने की सुविधा, न पंद्रह साल में हर जलसे में दिल को ठंडक पहुंचाने वाले वे एसी वाले डोम..!

मैं ही क्या लगभग सारा मीडिया मानकर चल रहा था कि आज तो शपथ और बाद में नेताओं के भाषण होंगे, कर्ज माफी वाले वादे पर कह देंगे कि केबिनेट की पहली बैठक में निर्णय लेंगे। इन्होंने तो हद ही कर दी, न तो इकट्ठा हुए हजारों कॉमन मैन के लिए भोजन के पैकेट का इंतजाम किया न मीडिया से पूछा, न खुद ने कुछ खाया और न ही महागठबंधन के नेताओं ने। पता नहीं दो सौ वीवीआईपी के लिए किए खाने के इंतजाम का क्या हुआ।

शपथ निपटाकर नई बिल्डिंग में पहुंचे और पहली फाइल ही क़र्ज़ माफ़ी वाली निपटा दी। ऐसे काम करते रहे तो चला ली सरकार। नए नवेले कॉमन मैन से कुछ तो सीखना पड़ेगा, ठीक है पीएमजी आप के दल के नहीं है, प्रधान सेवक पर अंगुली उठाने वाला अध्यक्ष तो है आप के पास। एक शानदार जलसा प्लान करना था, ये सब भी आप को कहां करना था। बस इवेंट मैनेजमेंट में माहिर अफ़सरों को काम पर लगा देते, डोम बनाने वाले मियां भोपाल में ही मिल जाते। इंदौर सहित बाकी जिलों के कलेक्टर गर्मी वाले मौसम में भी अतिवृष्टि का अनुमान लगाकर स्कूलों में छुट्टियां करा देते, आरटीओ से लेकर बाकी जिलों के परिवहन अधिकारी भी स्कूली बसों का इंतजाम कर देते, हर जिले-तहसील में कार्यकारी अध्यक्षों की जो फौज खड़ी की है, उसे भी भीड़ जुटाने का काम मिल जाता।

भोजन पैकेट का ठेका किसे देना है, ऐसी सारी झंझटों के आसान हल बताने वाले अफसरों को भी फस्ट इंप्रेशन जमाने का मौका मिल जाता, लेकिन आप तो कच्चे खिलाड़ी साबित हुए । परिवार को शपथ में ले आए ठीक किया, लेकिन किसी एक सदस्य को अभी से ट्रेनिंग लेने के लिए तैयार करना ही चाहिए। वैसे भी आप शुगर के मरीज़ हैं| झल्लाना, चिड़चिड़ापन तो रहेगा। आप के अपसेट होने पर परिवार का कोई तो ऐसा सदस्य रहे, जिससे बाहर के लोग नफ़े-नुकसान की बातें बेतकल्लुफ़ी के साथ कर सके। अफ़सरों को तो सलाहकार के रूप में रख ही रहे हैं, बारासिवनी वाले अपने संजय भैया फुरसत में हैं, नकुल-बकुल भी मामा-अंकल कह लेंगे।

किसान सम्मेलन के जरिये झांकी जमाने का पहला मौका तो छोड़ ही दिया। बढ़िया सम्मेलन होता, मांदल की थाप पर नृत्य, साफे-तीर कमान वाले कुछ फोटो लुभाते, अन्नदाता भी आपके और श्रीमंत के चरणों में लोटपोट होते फिर पूरी ठसक और अहं के साथ होती कर्ज़ माफी की घोषणा, वचन-पत्र के परिशिष्ट और चित्रमय झलकी के साथ प्रदेश का कॉमनमैन देखता-पढ़ता तो वह भी अच्छा महसूस करता।

आप तो दूसरे दिन भी चूक गए…! पुलिस महकमे के बीच बैठे, उनकी सुनी, अपनी सुनाई और पहली ही बैठक में नए साल से पुलिसकर्मियों को वीकली ऑफ की घोषणा भी कर दी। अरे ! कम से कम खाली ख़ज़ाने का कुछ तो खयाल किया होता| पहले इंदौर पुलिस की तरह बाकी जिलों में पुलिसकर्मियों को कॉमनमेन से वसूली के काम पर तो लगाते, कुछ टारगेट फ़िक्स करते। अपने काम से पुलिस महकमा आप के चेहरे पर मुस्कान देखता, फिर पीएचक्यू में सम्मान का प्लान तैयार होता, वहां फिर प्रजातंत्र के मुखिया के रूप में करते वीकली ऑफ की मुनादी तो कुछ और बात होती। और हां, पुलिस की वर्दी बदलने की घोषणा मत करना, करना ही हो तो इतना करना कि कॉमनमैन के मन में पुलिस को लेकर जो दहशत है, वह गुंडों में ट्रांसफर हो जाए। पुलिसकर्मियों को ऑफ की बात तो अभूतपूर्व कॉमनमैन ने भी कही थी, फर्क इतना है कि आप नए साल का यह तोहफ़ा दे रहे हैं। यह घोषणा तामझाम वाले इवेंट में की होती तो हम भी किसी हेडसाब की बीवी से पूछ लेते| सीएम साब की इस घोषणा से कैसा लग रहा है, सीपीआर को भी उस सकुचाते पुलिस परिवार की सीएम गाथा को हाफ पेज में जारी करने का मौका मिलता।

खैर अभी तो संविदा शिक्षक, हेल्थ डिपार्टमेंट और तृतीय-चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों से लेकर व्यापारिक-सामाजिक संगठनों से वचन-पत्र में किए सैकड़ों वादे पूरे करना है। हर जिले में जाने कितनी बार पगड़ी पहनाकर, तलवार भेंट कर अभिनंदन समारोह होना बाकी हैं। एक तरह से भूतपूर्व वित्तमंत्री मलैया ने ठीक ही कहा कि जैसा खजाना दिग्विजयसिंह ने हमें सौंपा था, वैसा ही खाली खजाना हमने कमलनाथ को सौंप दिया। सुना है आप भी दावोस जा रहे हैं| आप के फार्म हाउस में सोयाबीन और बाकी फ़सलें तो नहीं होती हैं, नहीं तो पता चले कि आप अपना माल बेचने का सौदा कर आए और मप्र का कॉमनमैन यही इंतजार करता रहे कि प्रदेश में उद्योग स्थापित करने के लिए कई एकड़ जमीन सस्ते में लेकर गए| महान उद्योगपति बस बच्चों की शादी का निमंत्रण देने ही आते रहेंगे या हमारे बच्चों के रोजगार का इंतजाम भी करेंगे।

दावोस जाने से मप्र का कुछ फायदा होगा कि नहीं यह बताने के लिए ही एक जलसा हो सकता है । जलसे-उत्सव जो भी हो, वे सब विश्वस्तरीय ही होना चाहिए बीते सालों में कम से कम इस मामले में तो एमपी का स्टैंडर्ड कायम हुआ है। कॉमनमैन बने रहना इतना सरल नहीं है, जैसे पहली बार गाड़ी चलाते वक्त क्लच की अपेक्षा पैर स्पीड पर जा पड़ता है, वैसे ही घंटी बजाने पर भी जब सेवादारों की फौज दौड़ते हुए नहीं आती, तब मन को समझाना पड़ता है| अपन अब कॉमनमैन हैं। कॉमनमैन होना अलग बात है और कॉमनमैन के पात्र को अभिनीत करना और अधिक चुनौतीपूर्ण है।

कॉमनमैन की चिंता में पंद्रह साल तक ठीक से सो भी नहीं पाए शिवराज सिंह से असली कॉमनमैन ने सारा हिसाब किताब एक झटके में चुकता कर लिया।आप या तो सत्ता में रहते हुए कॉमनमैन को याद रखिए या कॉमनमैन हुए शिवराज सिंह की इस बयान की गंभीरता समझ लीजिए कि पांच साल से पहले लौट सकता हूं सीएम हाउस।

-कीर्ति राणा

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)  

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