सभ्यता और धर्म के नाम पर…

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यह वाक्य मेरा नहीं है, यह वाक्य है कालजयी व्यंग्यकार स्व.हरिशंकर परसाई का| यदि आज वे ज़िन्दा होते तो इसी अगस्त महीने में पचानवे वर्ष के हो जाते और हम उनसे पूछते कि हमारी आज की परिस्थितियों पर आप क्या लिखेंगे? इस पर उनका सीधा सा जवाब होता कि अब मुझसे क्यों कागज़ काले करवा रहे हो| देख लो, फलां समस्या पर, फलां जगह पहले से मेरा लिखा हुआ मिल जाएगा| उन्हें पढ़ने वाले सचमुच इस बात की तस्दीक़ भी कर देंगे कि उन्होंने अपने समय में ही आने वाली एक-दो नहीं, दसियों पीढ़ियों के लिए सार्थक लिख दिया था|

जैसे आजकल सड़क से संसद तक और सभी छोटे-बड़े न्यायालयों से अकादमिक परिसरों तक हमारी चिंता और पीड़ा का विषय बनी ‘लिंचिंग’ पर हमारे लिए, हमारे सन्दर्भों में ही वे बरसों पहले ‘आवारा भीड़ के खतरे’ लिख चुके थे| उन्होंने अपने इस कालजयी व्यंग्य निबंध में लिखा था कि दिशाहीन, हताश, नकारवादी, विध्वंसवादी और बेकार युवकों की इस खतरनाक भीड़ का उपयोग खतरनाक विचारधारा वाले लोग आसानी से कर लेते हैं| यह भीड़ उन्मादियों के पीछे हो जाती है, जिसे वे अपने लिए या राष्ट्रीय और मानव मूल्यों या लोकतंत्र के खिलाफ भी कर लेते हैं|

यदि आप पूरे विवेक के साथ सिर्फ और सिर्फ राष्ट्र और समाज के हित में ही खड़े हैं तो आप भी उनकी इन पंक्तियों को सच ही मानेंगे, लेकिन जब भी ‘लिंचिंग’ पर बात होती है तो हम सब ‘अंधों के हाथी’ की तरह अपनी पकड़ में आई चीज़ों को ही अंतिम मानकर उसकी अपनी परिभाषा दे देते हैं, जिसमें अपनों को छोड़कर शेष लोगों को दोषी भी करार कर देते हैं, लेकिन एक बार देख तो लें| शायद यह राक्षसी वृत्ति जिम्मेदारों के प्रति अविश्वास तो नहीं है|

न्यायपालिका सरकार को जिम्मेदार ठहरा देती है तो सरकार शिक्षा परिसरों को दोषी मानती है और शिक्षा परिसर समाज सहित सबके माथे पर यह कलंक मढ़ देते हैं| समाज सरकार से पूरी अपेक्षाएं करता है| अपने आप को दोषमुक्त मानकर बात कर रहे इन सब लोगों से किसी ने भी, कभी भी अपने खुद के गिरेबां में झांकने का न तो निवेदन किया और न इन्होंने उस तरह से कभी सोचा|

धर्म, सभ्यता और सदाचार की उम्मीद में पूरे असभ्य तरीके से, बिना अपील, बिना वकील और बिना मुन्सिफ के भरे बाज़ार में, चौराहे पर पूरे अधर्म के साथ जो दुराचार होता है, उसे पता नहीं क्यों सामाजिक स्वीकृति भी मिल जाती है| भारत में भी किसी एक व्यक्ति या पूरे के पूरे एक जाति-समूह के ‘लिंचिंग’ के बहुत सारे आंकड़े अपने पास उपलब्ध तो हैं ही, खरोंचों की तरह स्मृति में भी बैठे हैं|

वैसे तो धर्म के नाम पर इस अधर्म,सभ्यता के लिए इस असभ्यता और सदाचार के लिए इस दुराचार के उल्लेख कुछ-कुछ धार्मिक पुस्तकों में ज़रूर मिलते हैं, पर सप्रमाण व दस्तावेजी पुरावों के साथ अठारहवीं सदी में राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर रहे इंग्लैंड और गृहयुद्ध से टूट-टूटकर फिर से बन रहे अमरीका से यह ‘उन्माद’ दुनिया में आया लगता है|

मनुष्य की याददाश्त जहां से शुरू होती है,वहीं से सब जानते हैं कि गोरी चमड़ी वालों ने काली चमड़ी वालों को हमेशा से ही इनसान मानने से इनकार कर दिया था| थोड़ी सी मानवीय समझ विकसित होने पर ‘कालों’ को मानव अधिकार देते समय कुछ सिरफिरे ‘गोरों’ ने उन्हें शत्रुतावश, भयवश या कहें अपनी जातीय श्रेष्ठता के तहत दबंगई में बीच बाज़ार में गोली मारने, अंग-भंग करने, चीथड़े बिखेरने या नोचने सहित जिन्दा जला देने के काम किए| उनका जातीय समाज इसमें गौरव महसूस करता था|

अमरीका के वर्जीनिया राज्य में गांव-देहात की अदालतों में ‘चार्ल्स लिंच’ और ‘विलियम लिंच’ नाम के दो बड़े किसान और सरपंच जैसे लोग न्यायाधीश थे| वे कमजोर कालों को बिना मुकदमा चलाए जेल में डालने, जेल से निकालकर खुलेआम गोली मार देने, फांसी पर लटका देने जैसी निर्मम सजाएं दे देते थे| तब इस हैवानियत को उन्हीं के नाम पर ‘लिंच-लॉ’ कहा जाता था| बाद में उन दोनों ने अपने मुल्क की संसद से भी आंतरिक सुरक्षा व राष्ट्र हित में युद्ध के समय की ज़रूरत बताकर अपने आप को कानून से मुक्त करवा लिया था| तब से ‘लिंच-लॉ’ या इसके तहत की जाने वाली नंगई और दबंगई को ‘लिंचिंग’ कहा जाने लगा| इतिहास की सबसे बड़ी विभीषिका विश्वयुद्ध भले अब न लौटे, पर धर्म,सभ्यता और सदाचार की स्थापना के नाम पर उन्मादी जिन्दा रहेंगे व भूख,बेकारी और हताशा इनके पसंदीदा ईंधन होंगे.

-कमलेश पारे

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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