झलकारीबाई ने बचाई थी रानी लक्ष्मीबाई की जान

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झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को हर कोई जानता है, परंतु क्या आपने कभी झलकारीबाई का नाम सुना है?  झलकारीबाई और रानी लक्ष्मीबाई का गहरा नाता रहा है। झलकारीबाई की आज 188वीं जयंती है। वीरांगना झलकारीबाई का जन्म 22 नवंबर 1830 को एक कोली परिवार में हुआ था। उनका गांव का नाम भोजला था, जो झांसी के पास था। उनके पिता का नाम सदोवर सिंह और माता का नाम जमुनादेवी था।

शुरुआती जीवन

भोजला गांव में जमुनादेवी और सदोवरसिंह के घर झलकारीबाई का जन्म हुआ। झलकारीबाई जब छोटी थी, तब ही उनकी माता का निधन हो गया। पिता ने झलकारीबाई को बेटे की तरह पाल-पोसकर बड़ा किया। झलकारीबाई बचपन से ही घुड़सवारी और हथियार चलाने की कला में निपुण थी। झलकारीबाई का विवाह महारानी लक्ष्मीबाई के एक तोपची पूरणसिंह से हुआ था। पूरण ने ही झलकारीबाई और रानी लक्ष्मीबाई को आपस में मिलवाया था। रानी लक्ष्मीबाई की वीरता से प्रभावित होकर वह उनकी सेना में शामिल हुई, जहां उन्हें हथियार चलाने का बेहतरीन प्रशिक्षण मिला।

झलकारीबाई का साहस

23 मार्च 1858 को रानी लक्ष्मीबाई ने अपने 5000 सैनिकों के साथ अंग्रेजों की पूरी फौज का सामना किया था। तात्या टोपे जनरल ह्यूरोज से पहले ही हार चुके थे। देखते ही देखते अंग्रेजों की विशाल सेना ने झांसी के किले को घेर लिया। रानी लक्ष्मीबाई उस वक्त किले के अंदर अपनी फौज के साथ घिर चुकी थीं। पूरी फौज किले के अंदर से ही अंग्रेजों पर हमला कर रही थी। ऐसे में झलकारीबाई ने उनके प्राण बचाने के लिए खुद को रानी बताते हुए लड़ने का फैसला किया। हुआ भी बिल्कुल वैसा अंग्रेजों ने झलकारीबाई को रानी लक्ष्मीबाई समझ लिया।

अलग-अलग कहानी बयां करती हैं झलकारीबाई की वीरता

इतिहास में झलकारीबाई को लेकर दो कहानियां प्रचलित हैं। पहली कहानी के मुताबिक, रानी के किले से सुरक्षित निकलने के बाद झलकारीदेवी ने उनकी तरह ही वेशभूषा धारण की। झांसी की सेना उनके आदेश का इंतज़ार करने लगी। झलकारीदेवी किले से बाहर निकली और अंग्रेज जनरल ह्यूरोज के शिविर में उनसे मिलने पहुंच गई। शिविर के बाहर झलकारीदेवी चिल्लाई कि उन्हें जनरल ह्यूरोज से मिलना है।

ह्यूरोज और उसके सैनिक काफी खुश थे कि उन्हें न सिर्फ झांसी मिल गई, बल्कि रानी लक्ष्मीबाई भी जीवित उनके हाथ लग गई। जनरल ह्यूरोज झलकारीबाई को रानी ही समझ रहा था। उसने उनसे पूछा क्या करना चाहिए। झलकारीबाई ने जनरल ह्यूरोज की आंख से आंख मिलाकर कहा, मुझे फांसी पर लटका दो। झलकारीबाई के साहस से प्रभावित होकर जनरल ह्यूरोज ने उन्हें रिहा कर दिया। वर्ष 1857 में अंग्रेजों ने झलकारी बाई को पकड़कर फांसी पर लटका दिया।

दूसरी कहानी के मुताबिक, झलकारी बाई अंग्रेजों से लड़ते-लड़के वीरगति को प्राप्त हुईं। बुंदेलखंड की झलकारीबाई को लेकर एक किवंदती काफी मशहूर है। किवंदती के अनुसार, झलकारीबाई का साहस देखकर जनरल ह्यूरोज दंग रह गया था। उसने कहा कि यदि भारत की 10 प्रतिशत महिलाएं भी आपके जैसी हो जाएं तो हम अंग्रेजों को जल्द भारत छोड़ना पड़ेगा। झलकारीबाई के सम्मान में भारत सरकार ने 22 जुलाई 2001 को डाक टिकट भी जारी किया।

कवि डॉ.प्रदीप कुमार ‘दीप’ ने झलकारी बाई के अदम्य साहस को अपनी पंक्तियों में कुछ इस तरह पिरोया है।

समर में थी वो रुकी हुई, अंग्रेस रोज को डाटा था।

निज अश्व हुआ जब जख्मी तो कृपाण से दुश्मन काटा था।।

वो अबला थी, पर योद्धा थी और वीरांगना कहलाई।

मनु के वेश में लड़ी वो तब, फिर लौट के न वो घर आई।।

रानी झांसी को बचा गई,ऐसी नारी थी झलकारी।

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