Janmashtami 2018: क्यों मनाते हैं दही-हांडी का उत्सव

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आज देश के कई स्थानों पर जन्माष्टमी का त्यौहार बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है| आज के दिन कई कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जिनमें दही-हांडी उत्सव का बहुत महत्व होता है| इस दिन के लिए लोग कई दिनों से तैयारियां करते हैं| दही हांडी का क्रेज़ महाराष्ट्र और गुजरात के साथ ही कई राज्यों में दिखता है| इसमें गोविन्दाओं का ग्रुप मटकी तोड़ने की प्रतिस्पर्धा में भाग लेता है| समूह पिरामिड बनाकर जमीन से कुछ फुट ऊंचाई पर लटकी मिट्टी की मटकी को तोड़ता है|

इसीलिए मनाते हैं दही-हांडी त्यौहार

भगवान श्रीकृष्ण बचपन में बहुत नटखट थे| उन्हें माखन, दही और दूध इतना पसंद था कि वे इसके लिए चोरियां भी करते थे| दूध और दही की मटकी लेकर जा रही गोपियों की मटकी को कान्हा गुलेल से तोड़ देते थे| कई बार उन्हें माखन चुराते हुए भी पकड़ा भी गया| श्रीकृष्ण को माखन चोरी करने से रोकने के लिए उनकी मां यशोदा ने एक बार उन्हें एक खंभे से भी बांध दिया था| इसके बाद से ही उन्हें माखनचोर के नाम से पहचाना जाने लगा|

दही-हांडी का उत्सव को मनाने के पीछे का एक वाकया भी प्रचलित है| कहा जाता है कि कान्हा के डर के कारण वृन्दावन में महिलाओं ने मथे हुए माखन की मटकी को काफी ऊंचाई पर लटकाना शुरू कर दिया| इससे नंदलाल और उनकी टोली के नन्हे हाथ मटकी तक नहीं पहुंच पाते थे| इसके बाद श्रीकृष्ण ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर एक पिरामिड बनाया और जमीन से काफी ऊंचाई पर लटकाई गई मटकी से दही और माखन चुरा लिया| इसी के बाद से दही हांडी का उत्सव मनाया जाने लगा| जो भी समूह इसमें भाग लेता है उसे गोविंदाओं की टोली और मटकी फोड़ने वाले को गोविंदा कहा जाने लगा|

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