देश के लिए तोड़ी मूर्ति

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चोर, चौकीदार, नामदार, कामगार, नीच, दुशासन, दुर्योधन, माँ की, बहन की सब कुछ सुन लिया इस चुनाव में, EVM पर जबरदस्ती किसी पार्टी विशेष की वोटिंग भी देख ली |

नाथूराम गोडसे हिन्दू आतंकवादी था ये भी पता चल गया|

इंटरनेट भारत में 1995 में नहीं बल्कि 1987 – 88 में ही आ गया था, मोदीजी से ये नया ज्ञान भी मिल गया |

बिकाऊ चैनल, स्क्रिप्टेड इंटरव्यू और खरीददार सरकार भी देख ली |

फिल्मो में काम करने वाले राजनीति में कितने आराम से काम कर सकते हैं यह भी देख लिया |

मुगलों, रामायण, महाभारत का इतिहास भी पढ़ लिया इस चुनाव में |

गोडसे : कमल हासन को माफ करें  

पर इतना कुछ होने के बाद भी लोकसभा 2019 का चुनाव मुझे कुछ अधूरा-अधूरा लग रहा था जैसे सड़क है, गाडी है ,ड्राइवर भी है पर उसे स्टार्ट करने वाली चाबी नहीं है | कल रात बंगाल में बीजेपी की रैली में ममता और मोदी के समर्थक भिड़े तो वो अधूरा, कुछ – कुछ पूरा होने लगा और जैसे ही आज के आधुनिक शिक्षित, सामाजिक, सांस्कृतिक और विधवा विवाह जैसी युग परिवर्तनकारी विचारधारा को जन्म देने और सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र को समर्पित करने वाले, मशहूर बांग्ला लेखक, समाज सुधारक और बंगाल के पुनर्जागरण के स्तम्भों में से एक श्रीईश्वर चंद्र विद्यासागर की प्रतिमा (Ishwar Chandra Vidyasagar Statue ) नेताओ की टुच्ची राजनीति का शिकार होकर लस्त,पस्त और ध्वस्त हुई तब जाकर मन को संतुष्टि मिली कि हां, हमारे देश के सुनहरे भविष्य के लिए चुनाव हो रहा है |

अयोध्या-विवाद का हल यह है

सोचिये मोदी-ममता की जंग में शिकार हुए ऐसे विद्यासागर को गरीबों और दलितों के संरक्षक के रुप में जाना जाता था। उन्होंने स्त्री शिक्षा और विधवा विवाह के खिलाफ आवाज़ उठाई थी। उन्होंने खुद एक विधवा से अपने बेटे की शादी करवाई थी। उन्होंने बाल विवाह के खिलाफ भी आवाज उठाई थी | पर शायद मूर्ति (Ishwar Chandra Vidyasagar Statue ) तोड़ने वालों की गलती नहीं है उनके आकाओ ने केवल सत्ता और अपने नेता के जयकारे लगाना ही सिखाया है और अपने नेता के तलवे चाटने के लिए अगर उन्हें राष्ट्र नायको के स्मारकों को तोडना पड़े या हिंसा-हत्या करनी पड़े तो भी कर जायेंगे | आखिर भारत के सुनहरे भविष्य का निर्माण जो करना है इस चुनाव में |

विद्यासागरजी (Ishwar Chandra Vidyasagar Statue ) ने देश के लिए क्या किया और उससे देश में नारी की स्थिति में क्या क्रांतिकारी बदलाव आये इसकी व्याख्या करने की ज़रूरत नहीं है, क्योकि आज के मज़बूत भारत की नीव में उनके विचारो की गहराई साफ़ नज़र आती है। एक बात पर आपकी तवज़्ज़ो चाहूंगा कि जो मूर्ति तोड़ी गई वो एक विचारधारा थी और जिसने तोड़ा वो उसी विचार से जन्मे एक स्वतंत्र और सभ्य राष्ट्र के स्वतंत्र नागरिक थे। पर जिनके कारण तोड़ी गई, वो क्या थे ? कि कौन थे ? इस देश के ही थे या दूसरे देश के ?ये सवाल आपके लिए छोड़े जा रहा हूँ पता चले तो मुझे बताये और हो सके तो चुनाव के पत्थरों से जो चूरचूर होकर ज़मीं पर पड़ी उस मूर्ति के लिए थोड़ा सा मातम भी मनाये |

भारत और चीन को आगे बढ़कर करना चाहिए पहल

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