निर्भया गैंगरेप के दोषियों की फांसी में देरी होना भी क्या न्यायसंगत है

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देशभर के लोगों के साथ मुझे भी 16 दिसंबर, 2012 की वह दर्दनाक घटना याद है जब निर्भया  (Nirbhaya Gang Rape and Murder) के साथ हैवानियत हुई थी. इस पूरी घटना के बाद तत्कालीन सरकार (Delay In Hanging Nirbhaya Convicts) ने जस्टिस वर्मा समिति का ऐलान किया. जिसने इस प्रकार की घटनाओं पर अपनी रिपोर्ट देते हुए बताया कि कानून को कैसे सशक्त बनाया जाए. निर्भया की मां को कई बार सुना और उनके संघर्ष को देखा उनके प्रति मेरा सम्मान बढ़ा की कैसे एक मां अपने बेटी के हत्या के आरोपियों को सजा देने के लिए संघर्ष करती हैं. मुझे याद है जब जुवेनाइल जस्टिस एक्ट (Juvenile Justice Act) में संशोधन की बता हो रही थी तब भी कुछ हिस्सों से इस संसोधन के खिलाफ आवाज उठी थी. मगर उस समय नाबालिगों के अपराध में भागीदारी की बढ़ती संख्या को देखते हुए इसे अनदेखा कर दिया गया.

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हाल के दिनों में सुप्रीम कोर्ट (Supreme court)  ने हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए अपराधियों की फांसी (Delay In Hanging Nirbhaya Convicts) की सजा को बरकरार रखा है. मगर दोषियों के पास पहले राष्ट्रपति (President) के पास जाने का विकल्प और राष्ट्रपति के निर्णय को चुनौती देने का विकल्प मौजूद था. कुछ अपराधियों ने इस विकल्प का इस्तेमाल कर लिया, जबकि कुछ का अभी शेष है. यह पूरी प्रक्रिया कानून के अनुसार है और ठीक भी. इस प्रक्रिया पर मीडिया समूह तथा राजनीतिक दल अलग-अलग प्रतिक्रिया दे रहे हैं. यह इंगित करता है कि हमने न्याय की पूरी प्रक्रिया को ठीक से समझा नहीं है या हम प्रक्रियागत न्याय में विश्वास नहीं करते हैं. हम रोज न्याय और न्यायगत प्रक्रिया को इसलिए कोसते हैं, क्योंकि कुछ अपराधियों को फांसी की सजा में देरी हो रही है. जबकि हम भूल जाते हैं कि इसी प्रक्रिया और इसी अदालत ने न्याय करते हुए अपराधियों को फांसी की सजा सुनाई है.

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न्यायालय और न्यायाधीशों की भूमिका तभी ख़त्म होगी, जब वे अपना फैसला (Delay In Hanging Nirbhaya Convicts) सुना देंगे. एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में न्यायव्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण भाग है जो सबके लिए समान रूप से उपलब्ध हो तथा सबको अपने को निर्दोष साबित करने का अवसर प्रदान करें. निर्भया के अपराधी संविधान और न्याय व्यवस्था में प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग ही कर रहे हैं, जो किसी भी दृष्टिकोण से अनुचित नहीं है. एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में हर किसी को अपने को निर्दोष साबित करने का हर अधिकार मिलना ही चाहिए चाहे, उसमें कितना भी विलम्ब हो.हाल के वर्षों में जब भी कोई गंभीर अपराध होता है तो हम फांसी की मांग शुरू कर देते हैं और जब कानून में यह बदलाव हो जाता है तो हम मान लेते हैं कि न्याय हो गया है. निर्भया का केस ऐसे गंभीरतम अपराधों की श्रेणी में आता है, जिसमें अपराधियों को बिना देरी के दंड मिलना ही चाहिए और वह दंड निर्धारित हो भी गया है. मगर दंड का पर्याय केवल फांसी है, यह मानना एक समाज के रूप में हमारी असफलता को दर्शाता है.

एक समाज के रूप में फांसी को अपराध रोकने का एकमात्र विकल्प मानना हमारी हताशा और अविश्वास को बताता है कि हमारे पास कोई उपाय और विकल्प नहीं बचा है, सिवाय किसी की जान लेने के. निर्भया के अपराधियों से जुड़े विषय को हाल के दिनों में न्याय की कसौटी मान लिया गया है, जो कि न्याय व्यवस्था और समाज दोनों के लिए हानिकारक है. हम मान कर चल रहे हैं कि अगर फरवरी में फांसी नहीं हुई तो यह न्याय प्रणाली की विफलता होगी, जबकि सत्य यह है कि वास्तव में यह न्याय व्यवस्था की जीत है जो कोई भी निर्णय जन भावनाओं के आधार पर नहीं लेती है.

बचाव पक्ष के वकील को समाज और मीडिया के लोग इस प्रकार का व्यवहार करते हैं जैसे वह स्वयं अपराधी (Delay In Hanging Nirbhaya Convicts) हो जबकि बचाव पक्ष का वकील एक पेशेवर व्यक्ति होता है, जो कई बार न्यायालय के निर्देश पर केस की पैरवी करता है. इसमें कुछ गलत नहीं है, क्योंकि कई बार यही वकील निर्दोषों की जान भी बचाता है.

मेरा मानना है की एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में सबको अपना पक्ष रखने का हक़ मिलना ही चाहिए. चाहे उस पर अपराध (Delay In Hanging Nirbhaya Convicts) का कोई भी आरोप हो, हमने अपने देश में यह देखा है कि किस प्रकार लोग अलग-अलग कारणों से लोगों के ऊपर आरोप लगाते हैं और उन पर मुक़दमा करते हैं. अगर देश में प्रक्रियागत न्यायव्यवस्था नहीं होगी तो समाज में अलग प्रकार का असंतोष व्याप्त होगा.

निर्भया के केस (Nibhaya case) में न्यायलय ने अपना फैसला सुना दिया है और वह फैसला अपराध के स्तर के अनुरूप है. हमें एक समाज के रूप में संवैधानिक प्रावधानों का सम्मान करते हुए इसके पालन का इंतज़ार करना चाहिए. हर विषय को न्यायालय और न्याय से जोड़कर देखने में न्याय और समाज दोनों को समान रूप से हानि होगी.

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– Mradul tripathi

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