इंदौर नहीं इंदौरी बने हैं नंबर वन

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विगत 2 वर्षों से स्वच्छ्ता सर्वेक्षण में इंदौर पहले नंबर पर आ रहा है| यह पुरे देश को चौंका देने वाला विषय है कि प्रदेश की सर्वाधिक जनसंख्या वाला शहर,प्रदेश का सबसे अधिक भीड़ भड़ाके वाला शहर, प्रदेश का एक बड़े बाजार और इंडस्ट्री वाला शहर आखिर स्वच्छता सर्वेक्षण में लगातार 2 वर्ष से पहले नंबर पर आ रहा है|  यह भारत और भारत से बाहर के लोगों के लिए चिंतन का विषय है|

कुछ लोग इंदौर की उपलब्धि का श्रेय प्रशासन को देना चाहते हैं, तो कुछ नगर निगम को, परंतु  इंदौर को स्वच्छ किसने बनाया यह केवल इंदौर जानता है| इसके पीछे हजारों इंदौरियों के प्रण की ताकत है, इसके पीछे वह सजगता है जो एक चॉकलेट खाकर उसकी पन्नी को डस्टबिन न मिलने तक अपनी मुट्ठी में दबाकर रखने को मजबूर करती है| यदि कहीं और कोई इक्का दुक्का इस तरह का आचरण करने लगे तो यकीनन या तो लोग उसे पागल समझेंगे या या फिर उसका उपहास उड़ाएंगे|

महात्मा गांधी स्वतंत्रता आंदोलन में प्रसिद्धी पाने के बाद भी जब अपना शौचालय खुद साफ़ करते थे, तब लोग कहते थे कि बापू आप यह कैसा काम कर रहे हैं| यह काम तो सफाई कर्मचारी का है|  इस बात को लेकर कुछ लोग बापू से  घृणा भी करने लगे थे |

भारत में स्वच्छता अभियान भी गांधीजी की जयंती से ही प्रारंभ हुआ था|  आज यह कहने में मैं कोई अतिश्योक्ति नहीं समझता हूं कि इंदौरियों के गांधीवादी आचरण के कारण ही शहर को भारत का सबसे स्वच्छ का खिताब मिला|

खुद स्वच्छ रहना और वातावरण स्वच्छ रखना इंसान की आदत में होना चाहिए और यह खुद तथा खुद के आसपास के दायरे से निकल कर व्यापक स्तर पर होना चाहिए | विगत दो वर्षों के स्वच्छता सर्वेक्षण से यह स्पष्ट है कि किसी शहर को स्वच्छ  अभियान से नहीं, अपितु आदत से बनाया जा सकता है| इंदौर में आकर स्वच्छता पर शोध करने वाले विदेशियों तथा अन्य राज्य के लोग अभियान और आदत के इस फर्क को समझ लें तो उनकी रिसर्च सफल हो जाएगी|

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