ब्रिटिश पाउंड पर छपेगी बोस की तस्वीर

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हमारे देश ने ऐसे कई वैज्ञानिक दिए हैं, जिन्होंने देश का गौरव विदेशों तक फैलाया है| आज भी उनके ज्ञान के कारण उन्हें याद किया जाता है| अब एक भारतीय वैज्ञानिक की तस्वीर विदेशी करंसी पर छपने वाली है, जो भारतीय इतिहास के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है| एक ऐसी करंसी पर बोस की तस्वीर छपने वाली है, जिस करंसी के आगे डॉलर भी बौना है| जहां भारत का रुपया डॉलर की बराबरी नहीं कर पा रहा है वहीं भारतीय वैज्ञानिक की तस्वीर डॉलर से ज्यादा औचित्य रखने वाली करंसी पर छपना देश के लिए किसी बड़े सम्मान से कम नहीं है| दरअसल, भारतीय वैज्ञानिक, जिन्होंने ‘पेड़-पौधों में इंसानों जैसा ही जीवन है’, की खोज की थी, उन्हें इंग्लैंड द्वारा बड़ा सम्मान दिया जा रहा है| भारतीय वैज्ञानिक जगदीशचंद्र बोस की तस्वीर ब्रिटेन के 50 पाउंड के नए नोट पर छापने की तैयारी शुरू हो चुकी है|

बैंक ऑफ इंग्लैंड द्वारा वर्ष 2020 में छपने वाले नोटों के लिए योजना बनाई जा रही है| इस योजना के अनुसार, भारतीय वैज्ञानिक जगदीशचंद्र बोस की तस्वीर को नोट पर छापने का प्रस्ताव रखा गया है| इसके लिए और भी कई वैज्ञानिकों के नाम प्रस्तावित किए गए हैं| इसमें जाने-माने वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग का नाम भी शामिल है| वहीं सैकड़ों वैज्ञानिकों ने बोस की तस्वीर के लिए अपना पक्ष रखा है|

कौन है बोस, जिनका नाम हुआ प्रस्तावित

ब्रिटिश राज के दौरान  30 नवंबर 1858 को बंगाल के ढाका जिले के फरीदपुर के  मेमनसिंह गांव में जन्मे जगदीशचंद्र बोस प्रसिद्ध भौतिकविद थे| उनके पिता  भगवानचन्द्र बसु ब्रह्म समाज के नेता थे और फरीदपुर, बर्धमान एवं अन्य जगहों पर उप-मजिस्ट्रेट या सहायक कमिश्नर थे| उनका मानना था कि इंसान को पहले अपनी मातृभाषा अच्छे से सीख लेनी चाहिए, इसके बाद ही किसी और भाषा को सीखना चाहिए| उन्होंने अपने बेटे बोस को 11 वर्ष की उम्र तक गांव के ही विद्यालय में शिक्षा दिलवाई ताकि उन्हें बांग्ला भाषा का अच्छे से ज्ञान हो| इसके बाद उन्हें कलकत्ता के सेंट जेवियर स्कूल में प्रवेश दिलाया गया|

लंदन से चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई

बोस, जिनकी जीव विज्ञान में रुचि थी इसलिए वे 22 वर्ष की आयु में चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई करने के लिए लंदन गए, लेकिन स्वास्थ्य खराब होने के कारण शिक्षा पूरी किए बिना ही उन्हें स्वदेश लौटना पड़ा| इसके बाद उन्होंने डॉक्टर बनने का सपना त्याग दिया और कैम्ब्रिज के क्राइस्ट महाविद्यालय के एक प्रोफ़ेसर की प्रेरणा के बाद वे भौतिकी के सहायक प्राध्यापक के रूप में प्रेसिडेंसी कॉलेज में पढ़ाने लगे|

नाइट की उपाधि

बोस ने कई महत्वपूर्ण खोज की, जिनमें पेड़-पौधों में जीवन की खोज, रेडियो और सूक्ष्म तरंगों पर अध्ययन सहित कई खोज की गई थी| ब्रिटिश सरकार ने 1917 में बोस की वैज्ञानिक उपलब्धियों को देखते हुए उन्हें नाइट की उपाधि दी गई थी| जगदीशचन्द्र बोस पहले वैज्ञानिक थे, जिन्होंने रेडियो तरंगे डिटेक्ट करने के लिए सेमीकंडक्टर जंक्शन का इस्तेमाल किया था और इस पद्धति में कई माइक्रोवेव कंपोनेंट्स की खोज की थी| इसके बाद अगले 50 साल तक मिलीमीटर लम्बाई की इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगों पर कोई शोध कार्य नहीं हुआ था| इतना ही नहीं उन्होंने यह भी बताया कि पौधों में उत्तेजना का संचार वैद्युतिक माध्यम से होता है न कि केमिकल माध्यम से| बाद में इन दावों को वैज्ञानिक प्रयोगों के माध्यम से सच साबित किया गया था| भारत में जन्मे बोस की तस्वीर यदि ब्रिटिश करंसी पर छाप जाती है तो इससे इतिहास रच जाएगा| अभी तक किसी भी भारतीय वैज्ञानिक को यह सम्मान प्राप्त नहीं हुआ है|

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