दबाव में देश, मचा हर तरफ त्राहिमाम…

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साल 2018 की शुरुआत हुई तो सभी ने सोचा होगा कि यह साल हमारे देश के लिए उन्नति का साल होगा क्योंकि यह साल मौजूदा सरकार के कामकाज का आखिरी साल है| पांच साल की सरकार में आखिरी साल ही सबसे महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इसके बाद फिर नई पारी के लिए तैयार होने का समय आ जाता है|  सत्तापक्ष एक साल में जनता को खुश करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा देता है ताकि सत्ता को फिर से हथियाया जा सके, लेकिन ऐसा हुआ नहीं! इस एक साल में सबने देश को गिरते देखा| देश सामाजिक तौर पर, मानसिक तौर पर, वैचारिक तौर पर, आर्थिक तौर पर और क़ानूनी तौर पर काफी नीचे गिर चुका है|  2018 में देश कई मायनों में पंगु हो गया, कई योजनाओं को तो जैसे लकवा ही मार गया| हम उन बिन्दुओं पर आज विचार कर रहे हैं, जिनके कारण देश का स्तर नीचे गिर चुका है|

# न्यायपालिका में मतभेद

12 जनवरी 2018 को देश की सबसे सभ्य कही जाने वाली हमारी न्यायपालिका सड़क पर थी| मीडिया के सामने कभी न आने वाले जज, प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए दिखे| मुद्दा था, न्याय व्यवस्था में सरकार का दखल| सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जज का यूं मीडिया के सामने आना इस बात को इंगित कर रहा था कि क्या जजों की नियुक्ति केंद्र सरकार के इशारों पर होनी चाहिए? मामला साफ़ था, सत्ता में बैठी सरकार चाहती है कि न्याय का तराजू उसके हिसाब से नापतौल करे| पूरे विश्व में भारतीय न्याय प्रणाली की निंदा की गई|

# सबसे निचले स्तर पर पहुंचा रुपया

अर्थव्यवस्था की दशा और दिशा नोटबंदी के बाद जैसे गायब ही हो गई थी| जब देश की अर्थव्यवस्था गुलाबी नोटों के साथ पटरी पर आई तो रफ़्तार बढ़ने के बजाय और सुस्त होती चली गई| देश की अर्थव्यवस्था तय करने वाले तेल का दाम कभी घटा नहीं और डॉलर की तुलना में रुपया कभी मजबूत हुआ नहीं| हालत यह है कि डॉलर की तुलना में रुपया इतना कमजोर हो गया कि 1 डॉलर के लिए हमें 73 रुपए अदा करने पड़े| अन्तराष्ट्रीय स्तर पर डॉलर की तुलना में किसी भी देश की मुद्रा जितनी गिरती है, उस देश की अर्थव्यवस्था उतनी ही गिरी हुई मानी जाती है यानी रुपया कमजोर हुआ तो हम सब कमजोर हो गए|

# पक्ष-विपक्ष के झगड़ों के कारण पूरे विश्व में किरकिरी

राफेल रक्षा सौदे को लेकर भारत की अंदरूनी नोकझोंक ने विश्व स्तर पर हंसी का पात्र बना दिया| रक्षा सौदे में हुई गड़बड़ी की जांच की मांग, जब विपक्ष द्वारा उठाई गई तो उसके बाद कभी फ़्रांस के पूर्व राष्ट्रपति को बचाव में सामने आना पड़ा तो कभी भारतीय रक्षा मंत्री को फ़्रांस जाना पड़ा| पड़ोसी देश पाकिस्तान और चीन ने राफेल मुद्दे पर हो रही बहस का भरपूर लुत्फ़ उठाया| पाकिस्तानी ने मीडिया ने तब हद कर दी,  जब भारत में राफेल पर हो रही बहस को अपने देश में लाइव दिखाना शुरू कर दिया| हमारी कमजोरी ने हमें सामाजिक तौर पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीचे गिरा दिया|

# कई स्वावलंबी योजनाओं का पतन

सत्ता में आई सरकार ने कई ऐसी योजनाओं का शुभारंभ किया, जिससे देश की परिस्थिति बदल सकती थी, लेकिन सरकार के पांच साल पूरे होने वाले हैं और कई योजनाएं शुरू होने से पहले ही खत्म हो गई| उदाहरण के तौर पर गांव को गोद लेने की योजना में शुरूआती दौर में जिस तरह लोगों ने गांवों को गले लगाया, फिलहाल आलम यह है कि कई हजार गांव बेबस और इस इन्तजार में हैं कि कब कोई लाल बत्ती वाली गाड़ी दिख जाए और उनका उद्धार करें|

# वैचारिक मतभेदों से जूझता देश

इस देश में जितनी भाषाएं बोली जाती हैं, जितनी जातियां लोकतंत्र को बांधे हुए हैं, उतने ही वैचारिक मतभेद देश में उभरकर आते हैं| ‘अनेकता में एकता’ वाले इस देश का आलम यह है कि हर इंसान का विचार दूसरे इंसान के विचार से भिन्न दिखाई देने लगा है| उदाहरण के तौर पर सत्ता में बैठे लोग यदि दिन को दिन कहेंगे तो विपक्ष में बैठे लोग उसे रात साबित करने में लग जाते हैं| देश में असामाजिक तत्वों को हटाने के लिए यदि सरकार की ओर से एनकाउंटर का आदेश दिया जाता है तो विपक्ष उन गुंडों को भले मानुष की उपाधि दे देता है| कभी-कभी सरकार की तरफ से भी दुर्बल और सच्चे लोगों को भी क्रिमिनल की उपाधि दे दी जाती है|

# जांच एजेंसियों पर उठते सवाल

हमारे देश में करप्शन इतना हावी हो चुका है कि इसने जांच एजेंसियों को तक नहीं बख्शा| देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी करप्शन की गिरफ्त में आ चुकी है| सीबीआई की बात करें तो अब लगता है कि उपर से लेकर नीचे तक सभी दागी हैं| अभी जो हो रहा है, वह और भी चिंताजनक है| अधिकारी आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना को इसीलिए छुट्टी दी गई क्योंकि उन पर भ्रष्टाचार के चार्ज लगे थे, लेकिन उनके स्थान पर जिन्हें बैठाया गया यानी नागेश्वर राव भी दूध के धुले नहीं निकले| स्थिति अब यह हो गई है कि ईमानदार अधिकारी लाए तो लाए कहां से|

देश के सामने समस्याओं का पहाड़ खड़ा है| आने वाले चुनाव में फिर किसी पार्टी को पांच साल दिए जाएंगे, हम सब यही उम्मीद करते हैं कि कोई आए और देश की गिरती व्यवस्थाओं को संभाले नहीं तो आने वाले कुछ सालों में न मिटने वाली हमारी हस्ती इतिहास बन जाएगी|

–   रंजीता पठारे 

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