मूंगफली में दाना नहीं-शिवराज अब मामा नहीं

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कल रात १० बजे जैसे ही टीवी चैनलों ने मप्र में कांग्रेस के कब्जे की ब्रेकिंग ख़बर दी वैसे ही वाट्सप और फेसबुक की दुनियां एक नया जुमला ट्रेंड में आ गया कि “मूंगफली में दाना नहीं शिवराज अब मामा नहीं “

समझ नहीं आया की प्रदेश में लाड़ली को लक्ष्मी बनाने वाले, बुजुर्गो को तीर्थ कराने वाले,किसानो को समर्थन मूल्य देने वाले, बेटियों का कन्यादान करने वाले शिव के राज़ में कहां चूक हुई जो 15 साल तक शिवराज को अपना बेटा, भाई,मामा,पापा मानने वाली मप्र की जनता ने उन्हें 16वा साल नहीं दिया|

वैसे परिवर्तन के नाम पर वोट मांगने वाली कांग्रेस के दिग्विजय काल( 1993 -2003 ) में मप्र की स्थिति देश में, सबसे दयनीय थी| बिजली कटौती इतनी चरम पर थी की जनता बिजली के जाने पर नहीं बल्कि आने पर आश्चर्य करती थी| सड़क पर गड्ढे नहीं थे लेकिन गड्ढों में सड़क,वैसे ही खोजी जाती थी जैसे दिवाली के बाद बच्चे धानी की थैली में मीठी पपड़ी के टुकड़े खोजते है| भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, गन्दगी, अपराध, उस समय के हिसाब से महंगाई उचाईयो को छू रही थी | यही कारण था कि 2003 के विधानसभा चुनाव में उमा भारती के नेतृत्व में बीजेपी ने मप्र की 230 विधानसभा सीटों मेसे 173 सीट जीतकर प्रचंड बहुमत के साथ दिग्गी राजा की सत्ता उखाड़ दी पर जनता उमा भारती को ठीक से समझ भी नहीं पाई थी की 2004 में एक वारंट आया उमा भारती के लिए और जोश-जोश में उमा भारती ने पद त्याग दिया जिसका अफ़सोस वो आज भी मनाती हैं| खैर ये हमारी कहानी का ज़रूरी हिस्सा नहीं है | फिर आये बाबूलाल गौर, वो भी ज्यादा दिन मुख्यमंत्री कक्ष की ठंडी हवा का सुख नहीं ले पाए और 2005 में उनकी भी विदाई हो गई | दुःखी मप्र अभी भी किसी चमत्कारी अवतार की प्रतीक्षा में “हीना” फिल्म का गीत “आ जा रे ये मेरा मन घबराये देर ना हो जाए कही देर ना हो जाये ” गा रहा था तभी इस फिल्म में एक नायक की तरह एंट्री हुई शिवराज पिता श्री प्रेमसिंह चौहान की| जिसने आते ही नर्मदा मैय्या की आरती की| गांव-गांव में दौड़ लगाई | दिग्गी राजा ने जिन गरीबो,दमितों, आदिवासियों को ठुकराया, शिव ने उन्हें गले लगाया, झोपडो में दिन बिताया,खाना भी खाया अब वो खाना झोपड़े में ही बना था इसकी ग्यारंटी हम नहीं दे सकते| फिर आया वो दिन जब शिवराज ने विकास पुरुष बनकर ऐतिहासिक नारा दिया ” बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ” और फिर बने आज़ाद भारत के वो पहले मुख्यमंत्री, जिसने योजनाओ का दरिया बहा दिया एक के बाद एक नई-नई योजनाए – मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना, मुख्यमंत्री कन्यादान योजना, लाड़ली लक्ष्मी योजना, मुख्यमंत्री ग्रामीण सड़क योजना, मुख्यमंत्री अन्नपूर्णा योजना, मुख्यमंत्री युवा स्व-रोजगार योजना, मुख्यमंत्री युवा इंजीनियर-कान्ट्रेक्टर योजना, निःशुल्क पैथालॉजी जाँच योजना, मुख्यमंत्री मजदूर सुरक्षा योजना | ग्लोबल इन्वेस्टर समिट के नाम पर देश-विदेश क उधोगपतियों के लिए रेड कार्पेट बिछाया उन्हें मप्र का महत्तव बताया जिनका फायदा हमे tcs और infosis के रूप में मिला भी पर इस राजशाही मेहमाननवाज़ी में मप्र का खज़ाना कितना खाली हुआ और उसके अनुपात में जनता का कितना फायदा हुआ हमे इस लफड़े में नहीं पढ़ना |

खैर साहब कहानी आगे बढ़ती है 2008 में फिर चुनाव फिर शिवराज काबिज़ हुए शायद इस विश्वास के साथ की अब शिव का राज़, रामराज बन जायेगा, कुछ हद तक ऐसा हुआ भी कृषि के क्षेत्र में मप्र की पहचान बड़े उत्पादक राज्यों में होने लगी इसी के साथ शिवराज सिंह चौहान की गिनती युग पुरुष में होने लगी | फिर आया 2014, जहा केंद्र की कांग्रेस सरकार से त्रस्त जनता ने केंद्र और राज्य दोनों में बीजेपी पर यकीन किया जिससे फिर शिवराज का राज हो गया |

बस यही से शुरू हुआ विकास पुरुष के पतन की दास्ताँ | गेहू उत्पादन के क्षेत्र में पंजाब और हरियाणा को हराकर कृषि कर्मण अवार्ड जितने वाले शिवराज सिंह चौहान को खुद पर इतना यकीन हो गया की वे अब मप्र को देश नहीं दुनिया का सर्वश्रेष्ठ राज्य बनाने का सपना देखने लगे, मप्र की सड़को को, अमेरिका से ज्यादा चिकनी बनाने के चक्कर में इतने मशगूल हो गए की उनका ध्यान ही नहीं रहा की मप्र की सड़के बलात्कार का अड्डा बन रही है | होश तब आया,जब राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) द्वारा प्रकाशित ‘भारत में अपराध 2016’ नामक रिपोर्ट जारी हुई  जिसमे बलात्कार के सर्वाधिक मामले मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में हुए। ऐसी वैहशियत भरी घटनाओं में से 12.5 प्रतिशत मध्य प्रदेश, 12.4 प्रतिशत उत्तर प्रदेश में घटित हुए मतलब उत्तर प्रदेश की आधी आबादी वाले मप्र में उससे ज्यादा बलात्कार | ये वो समय था जब घोषणाओं से निकलकर शिवराज को चिंतन की ज़रूरत थी पर नहीं की |

प्रदेश की महिलाओ और आध्यात्मिक महापुरुषों द्वारा प्रदेश में शराब बंदी की अपील की गई पर राजस्व के लालच में उसे नज़र अंदाज़ करने वाले शिवराज ये भूल गए की राजस्व के लिए राज ज़रूरी होना ज़रूरी है | मंदसौर में हुआ किसान गोली कांड तो मप्र के ताबूत की कील बन गया और वो इंसान जिसे जनता ने कभी भगवान माना था अब भाव विहीन इंसान लगने लगा जिस पर जनता का भरोसा टूटता जा रहा था | आशीर्वाद माँगा नहीं जाता वो तो स्वयं मिल जाता है इसलिए रथ में बैठकर जनआशीर्वाद यात्रा पर निकले शिवराज को जनता ने आशीर्वाद नहीं, कोरी घोषणा वाले मामा का तमगा दिया|


जिसका परिणाम है मप्र में फिर उसी कांग्रेस का राज़ जिससे मुक्ति दिलाने के लिए लोगो ने 1 नहीं 2 नहीं 3 बार शिवराज को अपना भाग्यविधाता बनाया था|
ये समय है इस बात के चिंतन मनन और विश्लेषण का, की आखिर वो क्या था जिसे शिवराज ने देखा नहीं या देखकर भी सुना और समझा नहीं ? जिस कारण मोदी, योगी, शाह मिलकर भी शिवराज की बाज़ी को शह और मात से ना बचा सके |
आखिर में तो मुझे किसी पुरानी फिल्म का एक संवाद याद आ रहा हे जिसमे नायिका कहती है कि मोहब्बत और नफरत के बीच बेहद बारीक़ लकीर होती है और मोहब्बत जितनी बढ़ती हे लकीर उतनी ही पतली होती जाती है | ये याद रखना
क्या शिवराज सिंह चौहान को मिली जनता की बेशुमार मोहब्बत को शिवराज सहेज नहीं पाए जिसकी नफरत चुनाव परिणाम के रूप में सामने आयी |

ये प्रश्न आपके मस्तक पटल पर छोड़े जा रहा हु | जवाब ज़रूर तलाशियेगा |

                                                                                                                                                                      धन्यवाद

विश्वम्भरनाथ  तिवारी

                                                                                                                                                                                                       

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