तोते के साथ उड़ गया राफेल…

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देश की सबसे विश्वसनीय माने जाने वाली सीबीआई के दो वरिष्ठ अफसरों की कशमकश के मामले में नए-नए मोड़ आते जा रहे हैं, जो कभी किसी ने सोचा नहीं होगा। सीबीआई पर हर राजनीतिक दल आरोप लगा रहा है कि वह सत्ताधारी दल के तोते का काम किया करती है। इस मामलों को लेने और उनकी जांच करने के बारे में अभी तक कोई निश्चित परिसीमाएं नज़र नहीं आती। आमतौर पर जिस राजनीतिक दल की पार्टी केंद्र में होती है, उसके इशारे पर जांच एजेंसियां कार्य करती हैं।

सीबीआई के लिए संवैधानिक स्तर पर ऐसी व्यवस्था है कि वह बिना किसी के दबाव के स्वतंत्र रूप से काम कर सके, परंतु सीबीआई की नकेल केंद्र सरकार के हाथ में हुआ करती है। एक वक्त था, जब कहा जाता था कि देश में कुछ संवैधानिक संस्थाओं को वास्तव में स्वतंत्र रूप से कार्य करने की आज़ादी है, परंतु देखने में आया कि हर संवैधानिक संस्थान सरकार के आगे नतमस्तक होती जा रही है। ऐसा शायद ही हुआ हो कि किसी संवैधानिक संस्थान ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला हो।

सीबीआई के निदेशक और विशेष निदेशक को एक-दूसरे पर आरोप लगाने के मामले में सरकार ने सीवीसी के माध्यम से उनको जिस तरह छुट्टी पर भेज दिया, उस पर सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला लिया, उसे भले ही कुछ लोग ऐतिहासिक बताएं, पर सच यह है कि यहां भी संवैधानिक रूप से ऐसी संस्था के दर्शन हीं हुए, जो वास्तव में अपने अधिकारों का उपयोग करके नज़ीर पेश करे। सीबीआई के डायरेक्टर आलोक वर्मा ने अपने को जबरन छुट्टी पर भेजे जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जो शिकायत की, उसमें कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है कि सीवीसी 15 दिन में जांच कर इस बारे में रिपोर्ट सौंपे।

गौरतलब है कि सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना ने कुछ समय पहले शिकायत की कि एक मीट व्यापारी ने अपना मामला दबाने के लिए वर्मा को 2 करोड़ रुपए की रिश्वत दी थी।  दूसरी तरफ निदेशक आलोक वर्मा ने अस्थाना पर उसी व्यापारी से 3 करोड़ की रंगदारी लेने का आरोप लगाया था| अस्थाना के खिलाफ शिकायत दर्ज हो गई इसलिए वे गिरफ्तारी से बचने के लिए कोर्ट की शरण में चले गए। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य मुद्दा यही था कि आलोक वर्मा को पद से छुट्टी पर भेजा जाना नियमों के अनुसार कितना सही है क्योंकि संविधान के मुताबिक उनके केवल प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और विरोधी दल के नेता ही वह तीन सदस्यीय समिति ही पद से हटा सकती थी, जो उन्हें नियुक्त करती है।

आलोक वर्मा को हटाया, बल्कि सीवीसी के एक अन्य प्रावधान के अनुसार उन्हें और अस्थाना को छुट्टी पर भेज दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अब सीवीसी को 15 दिन में आरोपों की जांच करके रिपोर्ट पेश करने को कहा तो दूसरी तरफ अंतरिम रूप से सीबीआई के मुखिया बनाए गए एम. नागेश्वर राव पर रोक लगा दी कि वे कोई बड़ा निर्णय नहीं ले सकते।

वहीं गत दिवस जब आलोक वर्मा की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट अपनी व्यवस्था दे रहा था, तब दूसरी ओर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में एक बड़ा हुजूम सीबीआई मुख्यालय पर पहुंच गया। राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि आलोक वर्मा राफेल की जांच करने वाले थे इसलिए सरकार ने उनको हटा दिया। अदालत में यह मामला नहीं आया जनता में जरूर अब यह संदेह बड़ा आकार लेने लगा है कि आखिर राफेल के मामले में सरकार किसी भी तरह के जांच से क्यों कतरा रही है।

कोर्ट ने हालांकि यह आदेश अवश्य दिया है कि मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट के एक रिटार्ड जज की निगरानी में होगी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले मे जिस तरह दो हफ्ते का समय जांच के लिए दिया है, उससे यह प्रमाणित हुआ है कि जहां तक न्याय का सवाल है हमारी प्रक्रिया अभी भी काफी धीमी है।  अब इस मामले में जल्द पता चलेगा कि आगे क्या होता है परंतु सीबीआई के इस विवाद से यह सवाल जरूर खड़ा हो गया है कि उसके समक्ष कोई प्रकरण आता है उसके बारे में उसे क्या फैसला लेना चाहिए।

गौरतलब है कि राफेल सौदे के बारे में भूतपूर्व मंत्रियों यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी, अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने भी कई दफा दस्तावेजों के साथ शिकायत की थी और वह समय सीमा भी पूरी होने वाली है जिसके अंदर सीबीआई प्रमुख को निर्णय लेना था। इसके पहले ही सीबीआई प्रमुख के पद से हट जाने के कारण यह जांच ठंडे बस्ते में चली गई। कोर्ट में भले ही राफेल का मामला आया हो, लेकिन एक संदेह छोड़ गया आखिर सरकार इसकी जांच करवाने से कतरा क्यों रही है।

-कुशाग्र वालुस्कर

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