दुनिया में गूंजा मिट्टी से निकले हुनरबाज़ों का शोर

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एक समय था, जब भारत के पास अपार सोने का भंडार था, जिस वजह से भारत को सोने की चिड़िया कहा जाने लगा| फिर अंग्रेज आए कई वर्षों तक हुकूमत की और  देश का सारा सोना बटोर कर ले गए| अब देश को लूटने की जो रही सही कसर बाकी थी तो वह कमी देश के नेता और विजय माल्या, नीरव मोदी जैसे कारोबारी कर रहे हैं| देश में गरीबी ज्यों की त्यों बनी हुई है| डिजिटल युग में भारत भुखमरी जैसी गंभीर समस्या से जूझ रहा है| हाल ही में ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत का स्थान 103वां रहा| गरीब परिवार के पास दो वक़्त की रोटी नहीं है| देश गरीबी की भट्टी में जल रहा है और इसी तपती भट्टी से निकल रहे हैं देश के असली हीरे मोती|

देश में गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के खिलाड़ियों के चमकने का सिलसिला जारी है| इस सिलसिले को ही आगे बढ़ाते हुए आकाश मलिक ने यूथ ओलंपिक 2018 में रजत पदक जीतकर इतिहास रच दिया| तीरंदाजी प्रतिस्पर्धा में इससे पहले अतुल वर्मा ने वर्ष 2014 में नानजिंग में हुए खेलों में कांस्य पदक जीता था| वहीं अब एक किसान के बेटे ने रजत तमगा हासिल कर यूथ ओलंपिक के इतिहास में अपना और देश का नाम दर्ज करवा लिया| हिसार के गांव उमरा के आकाश मलिक उस किसान के बेटे हैं, जो खेती के दम पर अपना घर चलाता है|

जब इम्फाल की बेटी ने रचा इतिहास

गरीब वर्ग से आकर चमकने वालों की फेहरिस्त में इम्फाल की बेटी थांगजाम तबाबी देवी का नाम भी शामिल है| यूथ ओलंपिक 2018 में उन्होंने भी रजत तमगा हासिल कर इतिहास रच दिया| उनसे पहले सीनियर या जूनियर ओलंपिक में कोई भारतीय जूडो में पदक हासिल नहीं कर पाया था| थांगजाम तबाबी देवी को पहला ओलंपिक पदक जीतने का गौरव हासिल हुआ| तबाबी ने 44 किग्रा वर्ग के फाइनल में वेनेजुएला की जिमेनेज से हारकर रजत पदक हासिल किया|

उम्मीद पर दुनिया कायम

आप सभी ने किसी न किसी से यह जरूर सुना होगा कि ‘उम्मीद पर दुनिया कायम है’, यही उम्मीद थांगजाम को यूथ ओलंपिक तक लेकर आई| मात्र आठ साल की उम्र में तबाबी जूडो अकादमी में भर्ती किया था| उन्होंने अपना शुरूआती प्रशिक्षण सुरजीत मीतेई, सुरचंद्र सिंह और रूपचंद्र सिंह से लिया| उनकी आर्थिक स्थिति काफी कमजोर थी| कई बार तो ऐसा मौका आया कि घर में खाना बनाने के सामान के लिए भी रुपए नहीं होते थे| तबाबी के कोच उनकी सही डाइट का बंदोबस्त करते थे| तबाबी सिर्फ इस उम्मीद पर टिकी थीं कि यदि वे इस खेल में अच्छा करेंगी तो उनके परिवार की हालत दुरुस्त होगी|

 ओलंपिक पदक जीतने की है क्षमता

थांगजाम तबाबी देवी अभी मात्र 16 साल की हैं| वे जेएसडब्ल्यू स्कॉलरशिप पाने के बाद से विजय नगर में प्रशिक्षण हासिल कर रहीं थीं| जरूरत पड़ने पर उसे विदेश में प्रशिक्षण लेने को भी भेजा जा सकता है| यह कहा जा रहा है कि 2020 में होने वाले टोक्यो ओलंपिक तक तो नहीं, पर उसके चार साल बाद यानी 2024 के ओलंपिक के लिए उसे अभी से प्रशिक्षित किया जाए तो वह जूडो में देश को पहला ओलंपिक पदक दिलाने की क्षमता रखती है|

खूब उड़ी हिमा दास

इस वर्ष एथेलेटिक्स चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीत कर हिमा दास रातोंरात पूरी दुनिया में छा गईं| यह उड़न परी भी गरीबी के दलदल से ही निकली है| असम के एक छोटे से गांव से निकलकर एथेलेटिक्स चैंपियनशिप तक पहुंचने का सफर हिमा के लिए किसी कांटों से भरे पथ से कम नहीं था| हिमा का जन्म असम के नौगांव जिले के कांदुलिमारी गांव के किसान परिवार में हुआ था| उनके पिता रणजीतदास खेती कर अपने पांच बच्चों का पालन- पोषण करते थे| हिमा भी अपने पिता के साथ खेतों पर काम करती थीं| खाली समय में हिमा लड़कों के साथ फुटबॉल खेलती थीं|

एक दिन युवा व खेल निदेशालय के कोच निपोन दास ने हिमा का खेल देखा, वे काफी प्रभावित हुए| इसके बाद उन्होंने हिमा को एथलीट बनने की सलाह दी और उनके परिवार वालों से भी बात की| उनके परिजन को कोच की बात तो समझ में आ गई, लेकिन उनके पास हिमा को ट्रेनिंग दिलाने के लिए पैसे नहीं थे| तब कोच ने हिमा की मदद की, पर फिर हिमा का संघर्ष शुरू हुआ|

सरकार गरीबों के लिए तो कुछ नहीं कर पाई, लेकिन गरीबी ने देश को हिमा दास, आकाश मलिक जैसे कई सितारे हीरे-मोती दिए हैं, जिन्होंने आर्थिक समस्याओं का सामना कर अपने देश का गौरव बढ़ाया साथ ही इतिहास के पन्नों पर अपना नाम दर्ज करवाया|

-ह्रदय कुमार

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