ये है अमृतसर रेल नरसंहार की जिम्मेदार

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अमृतसर की रेल त्रासदी के लिए अगर कोई ज़िम्मेदार है तो वह है रेलवे विभाग में व्याप्त ‘ब्यूरोक्रेसी की जड़ता’ । 1964 में भारत में अन्मेन्ड लेवल क्रासिंग गेट की संख्या 17 हजार से ज़्यादा थी। सैकड़ों लोग प्रतिवर्ष यहां मरते रहते हैं । आज भी भारत में 3469 ऐसे रेल सड़क के बीच जंक्शन हैं, जहां कोई क्रासिंग पर फाटक नहीं है । मैंने 1964 में रेल्वे मंत्रालय को ‘स्वचालित लेवल क्रासिंग फाटक’ लगाने की योजना प्रस्तावित की थी । रेल्वे बोर्ड ने मेरी योजना की पूरी विस्तृत जानकारी, डिजाइन तथा सभी तकनीकी जानकारी ऑफिशियली पत्र लिखकर मंगवा ली थी । तत्पश्चात जनवरी 1965 में रेल्वे बोर्ड ने लिखित में मुझे सूचित किया कि जो डिवाइज़ मेरे व्दारा प्रस्तावित की गई है, उसे भारतीय रेलवे में पहले ही विकसित कर लिया है ।

दुर्भाग्य से 1964 से लेकर आज तक भी देश में किसी जगह ‘स्वचालित लेवल क्रासिंग गेट’  कहीं पर भी स्थापित नहीं किए जा सके हैं । यदि रेलवे ने मेरे व्दारा सुझाई गई युक्ति 1964  के पहले ही विकसित कर ली थी तो आज तक उसे कहीं पर क्यों नहीं लगाया जा सका है ?

असली में रेल्वे और भारत सरकार के बड़े से बड़े तकनीकी विशेषज्ञों का ज्ञान महज़ उस स्तर तक सीमित है , जब वह वर्षों पूर्व अपने इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ते थे । आधुनिकतम ताजा तकनीकी प्रगति की उन्हें कोई जानकारी नहीं रहती है। उन्हें नई जानकारी का पाठ बड़ी-बड़ी विदेशी कम्पनियों के पीआरओ और एक्सपर्ट पढ़ाते रहते हैं, जिनके करोड़ों के टेंडर मंज़ूर करके ये रेल का आधुनिकरण करते हैं । संलग्न दस्तावेज मेरे इस निष्कर्ष की पुष्टि करते हैं।

अब बुलेट ट्रेन और हायपरलूप रेल भी भारत में आ रही है, बधाई ! पर इसमें ( महज पैसों के अलावा ) भारतीय क्या है ? आजादी के 70 साल बाद भी हम विदेशी कीलें खरीदकर, दीवार पर ठोककर, वन्दनवार लटकाकर कब तक जश्न मनाते रहेंगे । हम अपनी तकनीकें क्यों विकसित नहीं करते हैं और जो कुछ करना चाहते हैं उन्हें ब्यूरोक्रेसी रोकती है । ऐसा कब तक चलेगा ?

आज के युग में तकनीकी विकास इतना अधिक हो चुका है कि जब एक कार के आगे जा रही कार अचानक रुक जाती है  तो पीछे चल रही कार में अपने आप ब्रेक स्वचालित तरीक़े से लग जाते हैं और पीछे की कार रुक जाती है। इससे टक्कर होने से बच जाती है ।

मैं आज भी उस तकनीक को विकसित करके उपहार में रेल्वे को दे सकता हूं , जिससे रेल के ट्रैक पर 5 मील दूर भी कोई व्यवधान आ जाए तो 120 किमी प्रति घण्टे की रफ़्तार से चल रही रेलगाड़ी टकराने के हादसे से पहले ही स्वचालित ढंग से अपने आप रुक जाएगी, पर हमारे देश का यह दुर्भाग्य है कि यदि हमारे देश का कोई व्यक्ति कोई नई युक्ति सुझाए तो हमारे यहां की ब्यूरोक्रेसी उसे मज़ाक़ में उड़ा देती है जबकि यही नई चीज़ किसी विदेशी कम्पनी की तरफ़ से आती है तो सब लोग उसे जाने समझे बिना गले लगाकर धन्य होते हैं ।

काश अमृतसर हादसे की ट्रेन में “रेल्वे ट्रैक डिटेक्शन की स्वचालित डिवाइज़” लगी होती तो यह रेलगाड़ी ट्रैक पर आदमियों को देखने के साथ ही ऑटोमेटिक ब्रेक लगाकर अपने आप रुक जाती । सैकड़ों लोगों की जान न जाती । मेरे विचार से अमृतसर के नरसंहार के लिए पूरी तरह हमारी ब्यूरोक्रेसी ज़िम्मेदार है।

-डॉ.राम श्रीवास्तव

(लेखक वरिष्ठ वैज्ञानिक और समीक्षक हैं)

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