विकास की होड़ को मत बना विनाश का मोड़, मोटर-कारों को छोड़ और पेड़ को मत तोड़

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“लापरवाही बनी फ़ज़ीहत
अब हवा की भी कीमत ”

अभी तक आप आये दिन खबर सुनते रहते है की फला आदमी भूख से मर गया लेकिन वो दिन दूर नहीं जब खबरों में आएगा फला आदमी पैसे न होने के कारण हवा (ऑक्सीजन) नहीं खरीद सका और उसकी मृत्यु हो गई। जी हां मनुष्य के आधुनिक और आरामतलब होने की चाह ने उसे अभिलाषा के ऐसे तिराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। जिसकी एक गली में अनाज दूसरी गली में पानी और अब तीसरी गली में मिलेगी हवा (ऑक्सीजन) जी हां हवा इसकी शुरुआत देश की राजधानी से हो चुकी है। अगर प्रकृति की इस चेतवानी को अनदेखा किया गया तो वो दिन दूर नहीं जब ऑक्सी प्योर जैसी हवा (ऑक्सीजन) की दुकाने हर गली मुहल्लों में होगी जहां 15 मिनट जिंदगी(ऑक्सीजन) के लिए 1599 रूपये देने होंगे। दरअसल प्रकृति ने हमें सब कुछ दिया लेकिन हम उसकी दी गई अनमोल वस्तुओं का उपयोग तो करते ही है. साथ में दुरुपयोग भी करने लगे जिससे पहले आसानी से मिलने वाला अनाज महंगा हुआ फिर मुफ़्त में मिलने वाला पानी की भी कीमत हो गई जब वह बॉटल में बंद हुआ तो। लेकिन इतने पर भी हम नहीं सुधरे और अब नौबत हवा(ऑक्सीजन ) खरीदने तक की आ गई है।

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“फर्नीचर और बंगलो की चाह ने पेड़ विहीन कर दिया
प्रदूषण को देख प्रकृति के प्रकोप ने हवा विहीन कर दिया”

हमने किताबो में पढ़ा है की भारत एक कृषि प्रधान देश है. मतलब विकास की बुनियाद को मजबूत करना है तो कृषि को बढ़ावा देना होगा। लेकिन आजकल के इंसानो ने कृषि से इस प्रकार मुख मोड़ लिया है. की अब यह कृषि प्रधान से कृषि व्यवधान देश हो गया है। जी हाँ अब लोग कृषि करने को खुद के विकास में व्यवधान समझते है। जो सही मायने कही जाए तो देश के विकास की नीव है जैसा मैंने पढ़ा है किताबो में, कृषि करने वाले कम हुए ट्रेक्टर हार्वेस्टर जैसे यन्त्र आये जिससे कम लोगो में ज्यादा काम हो। इस बदलाव से काम तो जल्दी होने लगा लेकिन ट्रेक्टर और कृषि यंत्रों के आने से वायु में प्रदुषण बढ़ा और दूसरी ओर पशुधन की आवश्यकता कम होने लगी जिससे लोगों ने धीरे-धीरे मवेशी रखना कम कर दिया जिससे इनकी संख्या कम होने लगी। और पशुओं से मिलने वाले दुग्ध उत्पादों में कमी आई लेकिन जनसंख्या उसी रफ़्तार से बढ़ रही थी जिससे दुग्ध की पूर्ति करना मुश्किल हो गया और इस अंतर ने जन्म दिया मिलावट को आजकल आये दिन ख़बरों में आता है की कही डिटर्जेंट वाला दूध मिला या कही कैमिकल वाला दूध मिला। अब दूसरे ओर जिन लोगों ने आधुनिक होने की चाह में गाँव की हवेली छोड़ शहर के कबूतरखानों को चुना गांव की शुद्ध हवा को छोड़ शहर के कारखानों और चिमनियों से मिलने वाले धुए को चुना वो सोच रहे है हम विकास की ओर जा रहे है। लेकिन ऐसा नहीं है सही मायने में वो विनाश की तरफ बढ़ रहे है। शहर में दौडती मोटर गाड़ियों के धुंए ने हमारे वायुमंडल को जहरीली गैस चैम्बर में तब्दील कर दिया है। गांव के पेड़ काटकर वंहा गगनचुम्बी इमारत और कारखाने बनाकर उसे शहर बनाया जा रहा है। और फिर और पेड़ काटकर उन्ही इमारतों को फर्नीचरों से सजाया जा रहा है। और कारखाने से निकला धुआँ धीरे -धीरे पूरे देश को दिल्ली बनाने की ओर बढ़ रहा है। पेड़ कम होने से बारिश अनियमित हुई जिससे कुएं तालाब झील कम हो गई और पानी के लिए बोरिंग की नौबत आ गई बोरिंग के बाद अब उसमे भी पानी कम हुआ तो पानी की कीमत बढ़ने लगी। पेड़ कटे वायु दूषित हुई और ऑक्सीजन की कीमत हो गई। इंसानो की सबसे से बड़ी खासियत यह की उसको यदि कोई चीज आसानी से मिल जाए तो उसकी कीमत नहीं होती। जब तक उसके लिए संघर्ष न करना पड़े या मोटी रकम न चुकानी पड़े।

JNU मतलब झगड़ा, नफरत और उन्माद

“इंसानों की भी अजीब फितरतें है,
जो ना मिले उन्ही की हसरतें है
जो सहज ही मिल जाएँ उसे कम मान देते है
करोड़ो मिन्नतों से मिलने वालों पर जी जान देते है”

अभी तक हमने प्रकृति को जितना नुकसान पहुंचाया उसके परिणाम थोड़ा कम घातक थे लेकिन इस बार की समस्या जटिल है. क्योकि पानी न मिलने पर उसे ढूढ़ने के लिए कुछ समय होता है। भोजन ना मिलने पर उसे जुटाने के लिए कुछ समय होता है. लेकिन हवा(ऑक्सीजन) ना मिलने पर उसे जुटाने के लिए समय नहीं मिलेगा। इसलिए अपनी आँखें खोलिये और हजारों पेड़ काटने के बाद 1 पेड़ लगाकर सेल्फी डालना बंद करिये। और जी भर के पेड़ लगाइये जिससे वायु शुद्ध होगी। समय पर बारिश होगी पानी की समस्या कम होगी। और कृषि एवं पशुधन को बढ़ावा दीजिये जिससे मिलावट कम होगी।

दिलवालों की नहीं लाशों की दिल्ली…

-मृदुल त्रिपाठी 

   (लेखक एवं संपादक )

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