हाफिज सईदः पाकिस्तानी दुविधा

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पाकिस्तान की सरकार की हालत कितनी दयनीय है। वह हाफिज सईद का बाल भी बांका नहीं कर पा रही है। लगभग पांच साल होने आ गए, लेकिन हाफिज सईद को वह अमरीका के हवाले नहीं कर सकी। अमेरिका ने उसके सिर पर लगभग 70 करोड़ रुपए का इनाम रखा हुआ है। पाकिस्तान सरकार कभी उसे नजरबंद करती है, कभी उस पर मुकदमा चलाती है और कभी उसको खुला छोड़ देती है। अब अमरीका की ट्रंप सरकार ने इतनी धमकियां दे दी हैं कि पाकिस्तानी सरकार उसके खिलाफ कुछ ठोस कार्रवाई करने पर उतारु है।

हाफिज सईद ने भी कच्ची गोलियां नहीं खा रखी है। यदि पाक सरकार डाल-डाल है तो वह पात-पात है। उसे एक अदालत पकड़ती है तो दूसरी अदालत छोड़ देती है। यदि उसकी एक संस्था पर प्रतिबंध का एलान होता है तो वह दूसरी संस्था खोल लेता है। अब वह एक राजनीतिक दल भी स्थापित करने का ऐलान कर चुका है। अदालत का रवैया भी ढुलमुल है। लाहौर के उच्च न्यायालय ने अभी-अभी कहा है कि समझ में नहीं आता कि सरकार सईद के पीछे हाथ धोकर क्यों पड़ी हुई है। उसके संगठन जमात-उद-दावा और फलाहे-इंसानियत फाउंडेशन समाजसेवा के इतने काम कर रहे हैं।

अदालत ने सरकार से पूछा है कि सईद की संस्थाओं पर से प्रतिबंध क्यों नहीं उठा लिया जाए ? पाकिस्तान की अदालत ही नहीं, फौज भी हाफिज सईद की प्रशंसक है! क्या यह संभव है कि फौज के वरद्हस्त के बिना हाफिज सईद पाकिस्तान में सुरक्षित रह सकता है ? जिसके सिर पर 70 करोड़ रु.का इनाम हो, वह बड़े-बड़े नेताओं की तरह खुलेआम सभाएं, प्रदर्शन और धरने कैसे आयोजित कर सकता है ? वास्तव में कश्मीर के सवाल पर सईद के संगठन पाकिस्तानी फौज के एजेंडे को क्रियान्वित करते हैं।

अमरीकी सरकार के दबाव के कारण अब पाकिस्तानी सरकार अपने 1997 के आतंकवाद-विरोधी कानून में संशोधन करके उसे इतना कठोर बनाना चाहती है कि सईद जैसे लोगों के संगठनों को पैसा, समर्थन और सहयोग मिलना पूरी तरह से बंद हो जाए। उनकी सख्त जांच हो और उन्हें सजा भी कठोर हो। सरकार ने इस संबंध में एक अध्यादेश भी जारी किया है, लेकिन सईद ने उसके खिलाफ अदालत में याचिका लगा रखी है, लेकिन कहा जा रहा है कि अब फौज भी सरकार का साथ देने लगी है।

यदि ऐसा है तो निश्चित ही कुछ ठोस कार्रवाई जरूर होगी, लेकिन हम यह न भूलें कि पाकिस्तानी समाज का चरित्र ही कुछ ऐसा बन गया है कि वहां आतंकवाद आसानी से पैदा होता है और पनपता रहता है, इसलिए वहां की सरकारें दुविधा में फंसी रहती हैं।

-डॉ.वेदप्रताप वैदिक

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं)

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