सरकार से आग्रह, लाओ ना! 

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रंगरोगन करने वाले कारीगर का तीन दिन पहले फ़ोन आया कि कुछ इंतज़ाम कर दें परिवार में शादी है। उसे अगले दिन आने को कह दिया| इससे पहले पलासिया से लेकर तुलसी नगर तक एक के बाद एक सभी बैंकों के एटीएम पर प्रयास किए, कई जगह तो गेट खोलने से पहले ही गार्ड इशारा कर देता या अंदर से ख़ाली हाथ निकलने वाले ग्राहक के हाव-भाव ही बता देते कि यहां भी नो कैश…! कारीगर को समस्या बताई, पहले तो वह हंसा| मैंने महसूस किया कि उसकी हंसी मेरी हंसी उड़ा रही है कि दस-पंद्रह हजार भी घर में नहीं रख सकते क्या…! मैंने कहा, तुम्हारे खाते में आरटीजीएस कर देता हूँ, उसने अपनी दस अन्य परेशानियां गिना दी, लेकिन मेरी परेशानी की गंभीरता उसके गले नहीं उतरी।

केंद्र सरकार की अच्छाइयों का बढ़-चढ़कर बखान करने वाले न्यूज चैनलों पर भी जब दो दिन से मप्र सहित अधिकांश राज्यों में एटीएम ठनठन गोपाल बताए जाने लगे, तब तो विश्वास करना ही पड़ा कि डिजिटल इंडिया में देश के अधिकांश एटीएम कैशलेस होकर सरकार का सपना पूरा करने में लगे हैं। अपन रघुराजन की बात पर भरोसा नहीं करते कि नोटबंदी और जीएसटी जल्दबाजी में उठाए कदम हैं, मनमोहन सिंह को भी चोटी का अर्थशास्त्री नहीं मानते, अमर्त्य सेन होंगे नोबेल पुरस्कार विजेता। जीएसटी का यह फ़ायदा तो हुआ है कि अब बिना बिल के कारोबार करने वाले महारथी भी थोड़ा बहुत व्यापार बिल से भी करने लगे हैं। मुनाफ़ा कम हो रहा है इसलिए ये ही सारे लोग बाजार में गए, धंधा चौपट कर दिया जैसे दुखा के गीत समूह स्वर में गा रहे हैं।

अपन तो नोटबंदी, जीएसटी को अच्छा इसलिए मानते हैं कि न तो अपने गार्डन में रुपए वाले पेड़ लगे हैं और न ही बिल फाड़ने वाला कारोबार है। इसलिए अपना तो स्वदेशी में भरोसा बढ़ा है और मोहन भागवत को नंबर वन मानते हैं। अपने भागवतजी कह रहे हैं कि तमाम तकनीक के बाद भी भारतीय समाज को नकद मुक्त बनाना संभव नहीं तो यह बात मोदी-जेटली के कान में न फूंकी हो, यह संभव नहीं लगता, फिर भी ये हालात हैं तो क्या माना जाए कि मार्गदर्शक मंडल का विस्तार हो रहा है।

ललित, नीरव, माल्या ने बैंकों की हजामत की और अब एटीएम…! मुझे तो लगता है कि वित्तमंत्री ने किडनी उपचार के चलते कुछ दिनों के लिए मंत्रालय जाना क्या बंद किया, विपक्ष ने रातोंरात सभी एटीएम पर धावा बोलकर सरकार के लिए संकट खड़ा कर दिया। वित्तमंत्री से अधिक ज्ञानवान तो एमपी गजब के सीएम निकले, जो अंदर की खबर ले आए कि विपक्ष ने दो हजार के नोट दबा लिए हैं। बड़े नोट ग़ायब होने से कम से कम अब यह तो ख़ुलासा हो ही गया कि दो हजार के उस नोट में ऐसी कोई चिप नहीं लगी है कि सरकार को इनकम टैक्स वालों का पता चल जाए कि किन जमाखोरों ने इन नोटों की गड्डियां गोदामों में रखी हैं।

नोटबंदी में सरकार ने एक हजार के नोट को तो जीते-जी मार डाला वरना कुछ राहत तो अभी मिल ही जाती। सरकार दो सौ और पचास की तरह हजार का नोट लाई नहीं तो जमाखोर दो हजार से ही प्यार करेंगे। पता नहीं देवताओं को दूध पिलाने वाले खबरिये किस काम में लगे हैं। सोशल मीडिया पर कोई झूठा ही चला दे कि सरकार दो हजार का बंद कर के ढाई हजार का नोट लाने वाली है तो अभी सारी तिजोरियां ख़ाली हो जाएं।

अपन तो 8 नवंबर 16 (काली दीवाली) की सुबह से बैंकों के बाहर क़तार में खड़े रहने वाली यादें भूल गए थे, पर शादी ब्याह के इन दिनों ने फिर वे डराने वाले दिन याद दिला दिए। बड़े-बूढ़े उड़ती धूल, गिरते पत्ते, काले होते बादल, हवा के झोंकों में महसूस होता ठंडापन जैसे लक्षण जानकर बेमौसम बारिश होने, बेमतलब देश में यहां-वहां दंगे भड़कने पर चुनाव नज़दीक होने का आकलन कर लेते थे। अब जब कि आधे से अधिक देश कैशलेस होने का दर्द झेल रहे हैं तो क्या अनुमान लगा लें कि वाक़ई चुनाव नज़दीक आ गए हैं और नोटबंदी के कारण कंगली हो चुकी पार्टियों के कारण ही यह संकट खड़ा हुआ है। सत्तापक्ष को तो ऐसे आरोपों से ऊपर रखना चाहिए क्योंकि उसने तो पाई-पाई जोड़कर इन्हीं महीनों में अति भव्यतम कार्यालय खड़ा कर दिखाया है।

-कीर्ति राणा

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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