शांतिपूर्ण ढंग से चर्चा कर समाधान निकालें

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अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम को कमजोर करने के सुप्रीम कोर्ट फैसले के विरुद्ध दलित समुदाय ने भारत बंद का आह्रान किया। उनका कहना है कि इस फैसले से कानून कमजोर होगा और दलितों के खिलाफ हिंसा बढ़ जाएगी। दरअसल देश की कुल जनसंख्या में 21 करोड़ से अधिक दलित हैं। 31 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अनुसूचित जातियां अधिसूचित हैं। 1241 जातीय समूहों को अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित किया गया है। सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्तर पर इनकी स्थिति को बेहतर बनाने, क्रूरतम अपराधों, संपत्ति, जान-माल, महिलाओं की सुरक्षा और आत्मसम्मान के लिए अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम-1989 बनाया गया, जिसे वर्ष 1990 में जनवरी में देश में लागू किया गया था।

2016 में इसमें संशोधन करके इसे और अधिक कड़ा बना दिया गया। यह समस्या तब पैदा हुई, जब पिछले दिनों न्यायमूर्ति आदर्श गोयल और यूयू ललित की पीठ ने इस कानून में परिवर्तन किया। पीठ ने उक्त कानून के दुरुपयोग को लेकर सरकारी अफसरों की तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए कहा कि एसटी-एससी कानून के तहत दर्ज मामलों में किसी भी लोकसेवक की गिरफ्तारी से पहले न्यूनतम उप अधीक्षक रैंक के अधिकारी द्वारा प्राथमिक जांच जरूर करवाई जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा कानून में बदलाव को लेकर दलित संगठन उग्र हो उठे और भारत बंद आंदोलन ने हिंसक रूप धारण कर लिया। 12 राज्यों में हिंसा भड़क गई और लगभग 14 लोगों की मौत हो गई। रेल और सड़क यातायात बाधित किया गया। आगजनी भी की। बेशक अदालत ने एसटी-एससी एक्ट के दुरुपयोग को रोकने के लिए यह बदलाव किया है। अदालत दलितों के हकों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन सवाल सरकार की प्रतिबद्धता का भी है और कुछ सवाल खुद उनके सांसद उठा रहे हैं। अभी कुछ महीने पहले केंद्रीय मंत्री अनंत हेगड़े ने कहा था कि उनकी पार्टी संविधान बदलने के लिए सत्ता में आई है।

इधर उत्तरप्रदेश में बीजेपी की दलित सांसद सावित्री फुले ने ‘संविधान बचाओ-आरक्षण बचाओ’ रैली कर सरकार को साफ संदेश दे दिया कि वे संविधान से छेड़छाड़ नहीं होने देंगी। उन्होंने डॉ.आंबेडकर के नाम के साथ ‘रामजी’ जोड़ने का भी विरोध किया।

उत्तरप्रदेश में डॉ.आंबेडकर की मूर्तियों के साथ तोड़फोड़ की घटनाएं थम नहीं रही हैं, जो इस बात की सूचक है कि यहां सवर्णों का एक तबका दलितों को अधिकार दिलाने वाले का विरोध कर रहा है। कुछ दिनों पहले हाथरस में एक दलित युवक को  अपनी बारात ले जाने के लिए सरकार से गुहार लगानी पड़ी क्योंकि गांव के ठाकुरों का कहना है कि जब उनके इलाके वाले रास्ते से पहले कभी बारात आई हीं नहीं तो यह नई मांग क्यों की जा रही है। जो रास्ता दलितों की बारात के लिए इस्तेमाल होता है, वहीं से बारात ले जाई जानी चाहिए। इधर गुजरात में भी दलितों पर अत्याचार की घटनाएं थम नहीं रही हैं। हाल ही में एक दलित युवक को इसलिए मार दिया गया क्योंकि उसने घुड़सवारी का शौक पूरा करने के लिए घोड़ा खरीदा और तमाम धमकियों के बावजूद अपने घोड़े पर बैठकर घूमता रहा।

इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश में दलितों की दशा कैसी है। क्या इस दयनीय स्थिति में दलित किसी कानून का दुरुपयोग करने की स्थिति में हो सकते हैं। हो सकता है कि कुछ मामलों में इस कानून का गलत इस्तेमाल हुआ होगा तो क्या इसके लिए सारे दलितों की सुरक्षा को दांव पर लगाया जा सकता है। कहना न होगा कि संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठते हुए दलितों के उत्थान, उनके अधिकार और सम्मान से किसी को परहेज नहीं होना चाहिए किंतु इसके लिए देश की संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, हिंसा फैलाना, बेकसूरों की हत्या कर देना भी उचित हल नहीं है। हिंसा से न कभी कुछ हासिल हुआ है, न कभी होगा। इस समस्या का शांतिपूर्ण एवं चर्चा करके स्थायी समाधान निकाला जाना चाहिए।

-कुशाग्र वालुस्कर
 भोपाल (मप्र)

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