औरतों का ख़तना, नारी अस्तित्व पर सवाल

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7 साल की एक प्यारी बच्ची, बिल्कुल वैसी जैसी आप बचपन में थीं या जैसी आपकी बहन बचपन में होगी, बेहद ही चुलबुली और मासूम| इस बच्ची को धर्म का भी कोई ज्ञान नहीं, उसे नहीं पता कि वह किस धार्मिक समुदाय का हिस्सा है|  इस बच्ची की मां, दादी, नानी इसे बाहर ले जाती  हैं, चॉकलेट देने का वादा भी करती हैं| बच्ची खुश है| इस बात से पूरी तरह से अनजान कि आज के बाद उसकी ज़िंदगी बदल जाएगी सिर्फ इसलिए नहीं क्योंकि उसके शरीर से कुछ घट जाएगा, बल्कि इसलिए क्योंकि उसके शरीर के साथ ऐसा करने से पहले न तो उसे बताया जाएगा और न ही उसकी अनुमति ली जाएगी|

बच्ची मां, दादी या नानी का हाथ पकड़े हुए है, जो उसे एक अंधेरे कमरे में ले जाती हैं| दाई या डॉक्टर द्वारा लड़की का ख़तना किया जाता है| ख़तना यानी उसके प्राइवेट पार्ट को धारदार ब्लेड से काट दिया जाता है| चीरा सिर्फ एक लगता है, लेकिन उसका घाव पूरी ज़िंदगी के लिए बच्ची के मन में बैठ जाता है|

यह किसी एक लड़की की कहानी नहीं है और न ही यह 200 साल पुराना कोई वाकया है| यह आज की बात है 2018 की, जब बड़े ही गर्व के साथ हम महिला सशक्तीकरण की बात करते हैं| औरतों का ख़तना एक ऐसी प्रथा है, जो आज भी भारत सहित दुनिया के बहुत से देशों में जारी है| भारत में औरतों का ख़तना दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय की एक प्रथा  है| बोहरा शिया मुसलमान होते हैं, जिनकी आबादी भारत में मुंबई, मध्यप्रदेश और गुजरात में अधिक है| वैसे तो बोहरा मुसलमान बहुत प्रगतिवादी माने जाते हैं, लेकिन औरतों का ख़तना करने की इस अमानवीय प्रथा को यह समाज अभी तक छोड़ नहीं पाया है|

जैसे ही कोई लड़की 7 साल की होती है, पहले दाइयों और अब डॉक्टरों द्वारा उनका ख़तना करवा दिया जाता है| यह जितना पढ़ने और सुनने में दर्दनाक लगता है, उससे कहीं ज्यादा भयावह यह उस बच्ची के लिए है, जिनका ख़तना किया जाता है| इस प्रक्रिया में महिला योनि के एक हिस्से ‘क्लायटोरियस’ को रेज़र से काट दिया जाता है| एक रेज़र से कई महिलाओं के ख़तना किए जाने से उन्हें संक्रमण होता है और बाद में बांझपन की शिकायत भी आती है| इसके अलावा जो घाव मन में रह जाते हैं, उनकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं| ख़तना के बाद कई बच्चियां सदमे से कोमा में भी चली जाती हैं| ख़तना से हुई मौत की संख्या भी चौंकाने वाली है|

यूनिसेफ के मुताबिक, दुनिया में हर वर्ष 20 करोड़ बच्चियों का ख़तना होता है| यह आंकड़े अपने आप में डरा देने वाले हैं और भारत में मुस्लिम समुदाय के प्रति तमाम उदारता के बीच सरकार आजादी के 70 साल बाद भी महिलाओं का ख़तना रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठा पाई है|

प्रधानमंत्री से गुहार

बोहरा समाज की महिलाओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को महिलाओं के साथ हो रही इस बर्बरता पर रोक लगाने के लिए अपील भी की है| समुदाय की महिलाएं अब एकजुट होकर संगठन के द्वारा भी इस अमानवीयता को रोकने के लिए काम कर रही हैं, लेकिन बावजूद इसके समाज के कथित सुधारक इस प्रथा को रोकने के लिए सकारात्मक कदम नहीं उठा पाए हैं|

सुप्रीम कोर्ट निकाल सकता है रास्ता…

दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय में नाबालिग बच्चियों के जननांग के खतने की प्रथा पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए| कोर्ट ने कहा कि इससे बच्ची के शरीर की संपूर्णता का उल्लंघन होता है| जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ को अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने बताया कि इस प्रथा से मासूम बच्चियों को अपूरणीय क्षति पहुंचती है, जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती है| लिहाजा इस पर रोक लगनी चाहिए| उन्होंने कहा कि अमरीका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और 27 अफ्रीकी देशों में इस प्रथा पर रोक है| गौरतलब है कि 16 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में महिलाओं के ख़तना पर विशेष सुनवाई होगी और बोहरा समाज की महिलाओं को उम्मीद है कि सर्वोच्च न्यायालय से उन्हें न्याय जरूर मिलेगा|

धर्म हमारे देश की एक ऐसी कड़ी है, जिसके नाम पर सियासत से लेकर दंगे सब जायज़ हैं, लेकिन किसी भी धर्म के नाम पर इस तरह का निर्दयी रवैया इंसानियत पर एक तीखा वार है| यदि धर्म से ऊपर उठकर  इस प्रथा को देखा जाए तो आपको यह महसूस होगा कि धर्म और समुदाय के नाम पर यह किसी महिला की आत्मा को झकझोर देने वाला दंडनीय कृत्य है|

-अंकिता सिंह

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