हर नागरिक को होना होगा सजग

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एक वक्त था, जब मानव प्रकृति को पूजता था। जैसे-जैसे मनुष्य ज्ञानवान हुआ, अपने हाथों सबकुछ तबाह करता चला गया। एक तरफ अंधाधुंध विकास हो रहा है, दूसरी तरफ पर्यावरण संरक्षण नहीं किया जा रहा है अत: प्रकृति ने भी अपना विकराल रूप दिखाना शुरू कर दिया है।

बिगड़ते पर्यावरण के प्रति विश्वस्तर पर जागृति लाने के लिए संयुक्त राष्ट्रसंघ ने जून 1972 में विश्व पर्यावरण सम्मेलन का आयोजन किया था। इसके बाद 5 जून 1974 को पहला विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया और आज भी जारी है। इसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण सुरक्षा और संरक्षण करना है, लेकिन पर्यावरण आज भी सुधरा नहीं है, बल्कि हम उसे और भी बिगाड़ते चले जा रहे हैं।

कहना न होगा कि बिगड़ते पर्यावरण के लिए मानव ही जिम्मेदार है। विकास की अंधी दौड़ ने हमें इस मुकाम पर ला खड़ा किया है, जहां से सिर्फ तबाही का मंजर ही नजर आता है। मिट्टी,पानी,हवा हर चीज प्रदूषित है। हमारे देश  में पर्यावरण संरक्षण के लिए तमाम आंदोलन भी चलते रहे हैं। इस सिलसिले में राजस्थान में हुए विष्णोई आंदोलन को भारत के इतिहास का पहला आंदोलन माना जाता है। वर्ष 1730 में जोधपुर के राजा अजयसिंह को महल बनाने के लिए लकड़ी की आवश्यकता पड़ी तो उनकी सेना की एक टुकड़ी खिजड़ी नाम के गांव में पेड़ों को काटने पहुंची, तब उस गांव के लोग अपने ही राजा के खिलाफ खड़े हो गए थे। सुंदरलाल बहुगुणा के नेतृत्व में चला ‘चिपको आंदोलन’ भी हमारे इतिहास में दर्ज है। दक्षिण भारत में भी चिपको आंदोलन की तर्ज पर ‘अप्पिको आंदोलन’  भी 1983 में कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ क्षेत्र में प्रारंभ हुआ था। सलकानी तथा निकट के गांवों के जंगलों को वन विभाग के आदेश पर काटा जा रहा था, तब इन गांवों की महिलाओं ने पेड़ों को गले से लगा लिया था। यह आंदोलन लगातार 38 दिनों तक चला था। सरकार को मजबूर होकर पेड़ों की कटाई पर रोक लगाने का आदेश देना पड़ा था।

दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि जंगल सुरक्षित हैं, उनको वैध-अवैध तरीके से काटा नहीं जा रहा है। बात केवल वनों के कटने तक सीमित नहीं हैं। स्वच्छता अभियान के बावजूद कचरा यहां-वहां बिखरा देखा जा सकता है। पॉलीथिन का इस्तेमाल पर्यावरण के लिए सबसे बड़ा संकट है।

यदि यह मान लिया जाए कि पर्यावरण बचाने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की है, तो यह ठीक नहीं होगा। समाज के हर एक नागरिक को पर्यावरण के लिए सजग होना होगा। इस जरूरी कार्य में हम सभी को अपने-अपने हिस्से का योगदान देना होगा। इसी सजग और संतुलित दृष्टिकोण से हम अपने पर्यावरण को सुरक्षित रख सकते हैं।

 

–  कुशाग्र वालुस्कर

 

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