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सोशल मीडिया से नष्ट होता सामाजिक तानाबाना  

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आज की आपाधापी वाली और इंटरनेट के माध्यम से तेज़ दौड़ने वाली जिंदगी ने हर किसी को प्रभावित करके रखा है| व्यक्ति जीवन के किसी भी पड़ाव पर क्यों न हो, उसके जीवन का हर पल आज संचार व तकनीक का मोहताज हो गया है। आज की तारीख में 63 % जनसंख्या मोबाइल फोन और 26 % जनसंख्या इंटरनेट का प्रयोग कर रही है, जो दिन-प्रतिदिन बढ़  ही रही है, जिसके फायदे तो अनगिनत है हीं वहीं दुष्परिणाम कहीं ज्यादा खतरनाक है इसलिए इसकी कार्य पद्धति और इसके इस्तेमाल करने के तरीके को भी समझना बेहद ज़रूरी है ।

पिछले कुछ वर्षों में सोशल नेटवर्किंग सिर्फ नई पीढ़ी तक ही नहीं बल्कि पुरानी पीढ़ी के साथ-साथ हर वर्ग के व्यक्ति के बीच लोकप्रिय हो गई है| साथ ही इसने व्यक्तिगत रूप से हमारे मित्रों, रिश्तेदारों , शिक्षा जगत, सामाजिक पटल और राजनीतिक पटल  पर  सम्पर्क स्थापित करने का एक क्रांतिकारी  स्त्रोत बनकर एक नई राह दिखाई है, जो व्यावसायिक दृष्टि से कारोबार को स्थापित और उसका विस्तार व प्रचार-प्रसार करने में काफी सहायक सिद्ध हो रही है। एक और जहां हम  सोशल मीडिया के माध्यम से दुनिया के वास्तविक समय से जुड़ कर दुनिया को मुट्ठी में करने का प्रयास लगातार कर ही रहे हैं वहीं निःसंदेह इससे रोजगार  के अवसर भी काफी बड़े स्तर तक बढ़े हैं l  यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि कहीं न कहीं सोशल मीडिया  रोजमर्रा की हमारी जिंदगी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन हमारे हर कार्य में सहायक व फायदेमंद के साथ-साथ सूचना के आदान-प्रदान में बहुत उपयोगी साबित हो रहा है।

बहरहाल,  हर सिक्के के दो पहलू होते हैं| इसका दूसरा पहलू देखें तो  किसी भी चीज का अत्यधिक या अनियन्त्रित उपयोग हमें कई दुष्परिणामों व  दुष्प्रभावों की ओर अग्रसर कर  सकता है| इस माध्यम से जहां गड़बड़ी, अराजकता, शंका आसानी से फैलाई जा सकती है, वहीं गुमनाम रहकर भी किसी भी कार्य को अंजाम दिया जा सकता है, जिसके कारण साइबर धोखाधड़ी, हैकिंग, साइबर वॉर  जैसे गंभीर अपराध व अपराधी तो बढ़े ही हैं वहीं  आज सोशल मीडिया एक लत के रूप में हमारे दैनिक जीवन में घर कर चुकी है, जिससे हमारी एकाग्रता तो प्रभावित हुई ही है| साथ  ही साथ  हमने अपने संपूर्ण संबंध यहीं तक सीमित कर लिए हैं| कुछ वर्ष पहले की बात करें तो चाहे जन्मदिन हो, वैवाहिक वर्षगांठ हो या कोई त्योहार हम अपनों के साथ मिलकर खुशियां साझा करते थे, मिलते थे बात करते थे| अब वहीं दूसरी ओर  आज के आधुनिक जीवन में हम सिर्फ संदेश भेजकर अंगूठा दिखाकर अपना फर्ज पूरा कर लेते हैं| बात यहीं खत्म नहीं होती|

आज जब भी हम कहीं किसी  पार्टी, किसी मिलन समारोह या मीटिंग में जाते हैं तो हम वहां होते हुए भी वहां नहीं होते हैं| हमारा पूरा ध्यान हमारे मोबाइल पर होता है और गर्दन झुकी हुई होती है । शायद हम यह सोचते हैं कि यदि वहां नहीं देखा तो या तो बड़ा आर्थिक  नुकसान हो जाएगा या प्रलय आ जाएगा|  इन्हीं कारणों से हमारे पारस्परिक व्यवहार और अन्य कई तरह की गलत भावनाओं को हम स्वयं  उत्पन्न कर रहे हैं| साथ ही हम अपने संबंधों का आकलन भी अपने सोशल मीडिया के खाते से जुड़े लोगों की संख्या से करने लगे हैं| बहरहाल, वास्तविक स्थिति इसके बहुत विपरीत होती है| ये सब सिर्फ  संख्या में ही रहती है, जरूरत पड़ने पर आप के साथ वे ही लोग खड़े होंगे, जो आपसे आत्मीयता से निःस्वार्थ भाव से जुड़े हैं।

देखा जाए तो हमने अपने  संबंध लाइक, शेयर व कमेंट तक ही सीमित कर लिए हैं l सेल्फी के इस नए युग में कहीं हम अकेले ही न रह जाएं क्योंकि हर व्यक्ति आज अपना संबंध, व्यवहार, रिश्ते-नाते, मान-सम्मान, उपचार, प्रचार-प्रसार इसी माध्यम द्वारा करना चाह रहा है, पर हाथ लग रही है निराशा, बीमारी, मानसिक तनाव और एक ऐसी बुरी लत जो बहुत बड़ी मुसीबत ला सकती है| अभिव्यक्ति की इस नई धारा में हमने ऐसे कई उदाहरण पिछले कुछ दिनों में ही  भारत में ही नहीं अपितु पूरे विश्व में इन्हीं सोशल मीडिया के जरिये देखे व सुने हैं, जिसने पूरी दुनिया को दहलाकर रख दिया था।

जहां लोगों को पिछली तीन पीढ़ियां भी याद नहीं, वहां हम हज़ार सालों की बात करें तो क्या ये बेमानी नहीं होगी| जहां बचपन पहले हंसी-ठिठौली, बड़े मैदानों में खेलकूद , आस-पड़ोस के आंगन में गुज़रता था, वह ही आज इस सोशल मीडिया, हाईटेक उपकरणों के  व्यापक विस्तार से बच्चों में एक नकारात्मक ऊर्जा का संचार कर रहा है| हम बच्चों को आधुनिक बनाने में आपत्तिजनक सामग्री परोसने में लगे हैं| जिन बच्चों को दोस्तों और किताबों के साथ अपना महत्वपूर्ण समय व्यतीत करना चाहिए, वो चारदीवारी में कैद होकर रह गए।

जैसा कि ऊपर लिखा भी है कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं वहीं सोशल मीडिया के सही इस्तेमाल को हमें समझना होगा| समय, स्थिति का ध्यान रखना होगा| हमें  अपनी अभिव्यक्ति  को इस बदलते स्वरूप में  जिम्मेदारियों के साथ इसका उपयोग  सोच-विचारकर बहुत बुद्धिमानी से करना होगा नहीं तो हम स्वयं अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार लेंगे, जिससे हम अपने निजी व सामाजिक संबंध खतरे में डाल देंगे।

-विशाल सक्सेना

(वरिष्ठ समाजसेवी, इन्दौर)

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