आरक्षण की हमारी दवा रोग से भी ज्यादा खतरनाक

0

मुझे बड़ा अफसोस है कि अपने आप को राष्ट्रवादी कहने वाली यह मोदी सरकार ऐसा राष्ट्रविरोधी काम करने जा रही है, जो अब तक की किसी भी सरकार ने नहीं किया। सरकार ने घोषणा की है कि वह अगले तीन साल में पिछड़ी जातियों की जनगणना करवा देगी। 2021 की जनगणना में यह काम पूरा हो जाएगा। जब 2011 की जनगणना चल रही थी तो मनमोहन सरकार ने भी ऐसी ही घोषणा की थी। मैंने उसका डटकर विरोध किया। देश के लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं, विद्वानों, कलाकारों और पत्रकारों को जोड़कर हमने ‘सबल भारत’ नामक संगठन बनाया और 2010 में जातीय जनगणना विरोधी आंदोलन खड़ा कर दिया। उसे सफलता मिली।

जातीय जनगणना अधबीच में रोक दी गई। लेकिन मोदी सरकार ने 2019 के चुनाव के खातिर यह इतना जबर्दस्त पैंतरा मारा है कि भारत में ‘सबल भारत’ के अलावा कोई इसका विरोध नहीं करेगा, क्योंकि सभी नेता और सभी दल थोक वोटों के गुलाम हैं।

यदि आज डॉ.लोहिया और डॉ. आंबेडकर जिंदा होते तो वे इस जातीय जनगणना का मुझसे भी ज्यादा और सख्त विरोध करते, क्योंकि वे भारत से जातिवाद का उन्मूलन करना चाहते थे। उन्होंने आरक्षण का इस्तेमाल दवाई की तरह करने के लिए कहा था लेकिन हमारे नेताओं ने इसे ही अपनी दाल-रोटी बना लिया है।

जातीय जनगणना की शुरुआत अंग्रेज ने 1871 में की थी ताकि 1857 में बनी भारतीय समाज की एकता को भंग किया जा सके। महात्मा गांधी के विरोध के कारण 1931 में यह राष्ट्रविरोधी कार्रवाई बंद हुई। अब 87 साल बाद एक दूसरा गुजराती इस कलंक को अपने माथे पर ढोएगा। अब तक भारत में लगभग 30 हजार जातियां और उपजातियों का अनुमान है।

वैज्ञानिक ढंग से जातीय जनगणना हो ही नहीं सकती। यही बात 1931 में अंग्रेज सेंसस कमिश्नर डॉ.जेएच हट्टन ने कही थी और 1955 में पिछड़ा आयोग के अध्यक्ष काका कालेलकर ने भी कही थी। काका ने राष्ट्रपति को जो पत्र लिखा था, उसमें कहा गया था कि आरक्षण की हमारी दवा रोग से भी ज्यादा खतरनाक है।

-डॉ.वेदप्रताप वैदिक

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं)

Share.