चुनाव के पहले ‘टैक्स पेयर’ का पैसा फूंक रहे

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आदरणीय मामाजी, माना कि आप राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी हैं, आपने प्रदेश के विकास के लिए सच में बहुत किया है। गरीब बेसहारा और निर्धन परिवारों के उत्थान के आपके कदम सच में सराहनीय हैं । आप ठीक चुनावों की ‘आचार संहिता’ लगने के पहले देश और प्रदेश के समाचार पत्रों में लाखों, करोड़ों, अरबों का जो विज्ञापन झोंक रहे हैं, यह थोड़ा ज्यादा हो गया । विज्ञापनों की आई इस बाढ़ से अब अखबारों का पाठक बोर हो गया । आपके इन विज्ञापनों को पूरा कोई नहीं पढ़ता। इसे सब लोग सरकारी फिजूलखर्ची कह रहे हैं । इतने भारी भरकम विज्ञापनों की ‘सुनामी’ से लोग ऊबकर यह सोचने को मजबूर हो रहे हैं कि क्या सचमुच आपकी कुर्सी डगमगा रही है? आप सच मानिए, मध्यप्रदेश में आपकी टक्कर का राजनीतिक क्षेत्र में कोई भी प्राणी अभी मौजूद नहीं है, फिर आपको डर किस बात का है ?

कमलनाथ कितना भी पैसा अपनी जेब से फूंके, पर वह सिर्फ छिंदवाड़ा की कोयले की खदानों की काली धूल से बाहर निकलकर अपना चेहरा उजला करने के लिए कितने भी हाथ-पैर मार लें, सब बेकार है क्योंकि हकीकत यह है कि ज्योतिरादित्य, दिग्गी राजा, अरुण यादव, सुरेश पचौरी आदि सब कोई मन ही मन कमलनाथ से कतई खुश नहीं हैं । फिर यह तो मानना ही पड़ेगा कि जब से कांग्रेस ने ‘सब चोर डाकू लुटेरों’ के साथ मिलकर गठबंधन किया है, तब से उसकी रही सही छवि भी धूमिल होती जा रही है। विशेषकर राहुल बाबा  की बचकानी उछलकूद को खुद कांग्रेस के बड़े नेता गलत मान रहे हैं। इससे यह तो सिद्ध हो गया कि ‘मामाश्री’ आपकी पार्टी को आगामी चुनाव में जीतने में कोई बड़ा जोखिम नहीं है ।

पता नहीं आपके कान में किसने क्या बुदबुदा दिया है, जो बिलाबजह आप चुनाव पूर्व  विज्ञापन पर विज्ञापन झोंकते चले जा रहे हैं, पर श्रीमान जरा यह तो सोचा होता कि यह अरबों रुपया उड़ाकर आपको क्या मिलेगा ? फिर यह रुपया आपके नानाजी का तो नहीं है । यह गरीब ‘टैक्स पेयर’ की खून-पसीने की कमाई का पैसा है , जिसे आप मीड़िया घरानों के ‘धन्ना सेठों’ की मोटी तोंद को और मोटा करने के लिए बिला वजह ठूंस रहे हैं।

मामाजी, यदि हम बड़े मीडिया घरानों के छोटे ‘रिपोर्टर्स’ की कानाफूसी की बात को सही मान लें तो यह किसी मामा का काम तो नहीं हो सकता| हां, यद्यपि कंस मामा ऐसा कर सकता है । मामूली से आदमी जो अखबारों के छापाखानों में काम करते हैं, उनका कहना है कि अखबार की प्रसार संख्या यदि बीस हजार है तो आप के विज्ञापन वाले पेज पांच-पांच लाख छप रहे हैं । उनका कहना है कि आचार संहिता लगने के बहुत पहले की तारीख में आप जिन विज्ञापनों की ज्यादा कापियां छपवा रहे हैं, ये क्या चुनाव के समय मतदाताओं को बांटने के लिए है क्योंकि आचार संहिता लगने के बाद यदि एक भी पंफलेट छापकर बांटा तो उसका खर्च चुनाव आयोग के कम्प्यूटर में दर्ज हो जाएगा। तो यह सब विज्ञापन क्या चुनाव आयोग की आंखों मे धूल झोंकने के लिए किया जा रहा है । आप तो चुनाव आयोग को बता देंगे कि ये सब विज्ञापन तो चुनाव की आचार संहिता लगने के पहले के हैं ।

श्रीमान मामाजी, यह अरबों रूपया विज्ञापनों में खर्च करने के बजाय पेट्रोल और डीजल की कीमतें कम करने में खर्च करते तो विज्ञापनों की तुलना में आपकी इस दयादृष्टि से आपकी पार्टी को कहीं ज्यादा वोट मिलते। मैंने तो आपको सच्ची-सच्ची बात बता दी, आगे जैसी आपकी मर्जी।

डॉ.राम श्रीवास्तव ([email protected])

(लेखक वैज्ञानिक और समीक्षक हैं)

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