बेहतर बातें और बेमेल हकीकत 

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पता नहीं,हममें से ज्यादातर लोग अखबार पढ़कर आखिर क्या करते हैं|किसने, कब और क्या कहा, उस पर क्या हुआ जैसे प्रश्न पूछने की बात तो अब रह ही नहीं गई है|इसलिए जिसकी जो मर्ज़ी पड़ती है,वह कह और करके भाग जाता है|हमारा दुर्भाग्य है कि जिन्हें भी ये प्रश्न पूछने चाहिए या अपने ही कहे के क्रियान्वयन पर नज़र रखना चाहिए, वे सब हमेशा ही कहीं न कहीं अस्त,व्यस्त और मस्त रहते हैं|

आज जब मैं यह लिख रहा हूं, तब अखबार की एक सुर्खी है कि कम्प्यूटर साइंस में पहली बार बनाए असिस्टेंट प्रोफेसर के पद|इसी खबर में वे सारी शंकाएं भी लिखी गई हैं, जो सरकार के निर्णय के साथ वहीं  उठना थीं, जहां यह निर्णय हुआ होगा|प्रदेश में 457 कॉलेज पहले से हैं व अब 44 नए खुलना हैं|उन 457 में से ज्यादातर में कम्प्यूटर केंद्रित डिग्री कोर्स तो हैं ही,सब में तीनों संकायों कला,विज्ञान और वाणिज्य की स्नातकीय कक्षाओं में आधार पाठ्यक्रम के रूप में कम्प्यूटर एप्लीकेशन विषय भी हैं|

अब आप ही बताएं कि इन पुराने-नए 501 कालेजों में 44 लोगों से क्या होगा ? प्रदेश भर में प्राध्यापकों के आधे से ज्यादा स्वीकृत पद पहले से खाली पड़े हैं|अब कोई पूछे भी,तो जवाब हाज़िर है कि अतिथि विद्वान पढ़ा देंगे, लेकिन,उनकी नियुक्ति कब होगी ? जहां इनकी ज़रूरत होगी,वहां इस विषय को पढ़ाने वाले लोग मिलेंगे भी या नहीं ? किसी को नहीं मालूम|

नए खुलने वाले कॉलेजों के भवन,उनमें शिक्षण सामग्री या अन्य सुविधाएं हैं या नहीं,कोई नहीं जानता है| स्वयं शिवराज सिंह जी चौहान के निर्वाचन क्षेत्र में कई जगह महाविद्यालय तो खुल गए हैं,पर भवन नहीं हैं|स्कूलों के कमरों में कालेज लग रहे हैं|प्रभारी प्राचार्य हैं,जिन्हें पढ़ाना भी है,और बड़े-बाबू का काम भी करना है|तहसील तो छोड़िये विकासखंड स्तर के कस्बों या इससे भी नीचे गाँवों में तक कालेज खोले गए हैं|माना कि उच्च शिक्षा के सर्वव्यापीकरण की मंशा से यह हुआ होगा,पर शिक्षा की गुणवत्ता का ध्यान रखा ही नहीं गया है|तीव्रतम प्रतियोगिता के इस जमाने में,हम अपने ही युवकों के साथ ऐसे ही न्याय कर पाएंगे|ऊपर से इन कालेजों से उत्तीर्ण हुए युवक दुनिया की होड़ में टिक पाएंगे ?

सरकारी कॉलेजों में शिक्षा की गुणवत्ता की बातें तो सब करते हैं,पर वह आएगी कैसे,भगवान को भी नहीं मालूम|योजनाएं तो सब बनती हैं,पर बनकर ताले में बंद हो जाती हैं|फिर थोड़े दिनों बाद इन्हें सब उन्हें हमेशा के लिए भूल भी जाते हैं|हर बार “नई घोड़ी नया दाम”|अभी की सरकार 15 सालों से लगातार है,इसलिए यह भी नहीं कह सकते कि वैचारिक मत भिन्नता के कारण एक दल की बनाई हुई योजना दूसरे ने भुला दी|

चूँकि आज ही सरकार ने महाविद्यालयीन शिक्षा की गुणवत्ता पर पुनः बात की है,इसलिए याद दिला दूँ कि वर्ष 2014 में इसी शासन ने एक आदेश निकालकर, प्रत्येक महाविद्यालय का मूल्यांकन ‘नैक'(नेशनल असेसमेंट एंड एक्रेडिशन कौंसिल) की तर्ज़ पर कराने की व्यवस्था की थी|’नैक’का मूल्यांकन व मान्यता शिक्षा की गुणवत्ता की गारंटी माना जाता है|हमारी उत्साही सरकार ने बाक़ायदा विस्तृत परिपत्र निकाला था|टीमें गठित कीं थीं|अकादमिक श्रेष्ठता के सारे मापदंड,जिनमें पाठ्यक्रम से लगाकर पर्यावरण और शोध से लगाकर सुविधाओं तक सब बातें शामिल थी,के आधार पर सब महाविद्यालयों का मूल्यांकन भी हुआ था|विधि-विधान से हुए इस ‘कर्मकांड’की रिपोर्ट भी शासन को समय पर ही दी भी गई थी|लेकिन, उसका क्या हुआ,किसी को नहीं मालूम|

अलबत्ता,इस औपचारिकता में श्रेष्ठ पाए गए कालेजों के प्रोफेसर्स को दूसरे और तीसरे दर्जे के कालेजों में ट्रांसफर कर दिया गया|इसलिए जो संस्थान अच्छे थे,वे शिक्षकों के अभाव में बिगड़ गए,और जो नीचे की श्रेणी में थे,वे सुविधाओं के अभाव में सुधर ही नहीं पाए|इससे जिन बेहतर महाविद्यालयों में, भारत सरकार की शीर्षस्थ अकादमिक और विज्ञान संस्थाओं (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग,सीएसआईआर,यूजीसी,मप्र, विज्ञान परिषद आदि ) द्वारा पोषित परियोजनाएं चल रही थीं,वे विपरीत रूप से प्रभावित हुई,उनके पेटेंट और शोध की मूल प्रवृत्ति अलग से हतोत्साहित हो गई|किससे कहें,कि इन परियोजनाओं में लगा धन भी जनता का ही है|
कालेजों की संख्या पर गर्व करना या राजनैतिक तुष्टिकरण के लिए जगह-जगह कालेज खोलना राजनैतिक उपलब्धि हो सकती है|लेकिन,इससे सचमुच में ‘विद्या’ की तो ‘अर्थी’ही निकल जाती है,जो अपने प्रदेश में हुआ है|महाविद्यालयों में प्रोफेसर्स के आधे पद बरसों से खाली हैं|नए परिवेश में बहुत जरूरी विषयों,इलेक्ट्रॉनिक्स,बायो-टेक्नोलॉजी,माइक्रो-बायोलॉजी आदि विषय पढ़ाने के लिए जिला स्तर के महाविद्यालय तो छोड़िये,महानगरों में भी इनके नियमित व योग्य शिक्षक नहीं हैं|

इसी सरकार ने वर्ष 2011 -12 को शिक्षा के गुणवत्ता वर्ष के रूप में मनाया था|महाविद्यालयीन शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने की शानदार योजनाएं भी बनी थीं|लेकिन वे किस ताले में बंद हैं,न कोई पूछने वाला है,न किसी को याद है|इन योजनाओं में शून्य-कक्षाओं,सेतु-कक्षाओं,प्रतिभा-बैंक और एम्बेसेडर प्रोफ़ेसर की योजनाएं थीं,जिन पर कोई बजट नहीं था,फिर भी ये भुला दी गईं या बस्ता-बंद हैं|
पुराने शिक्षाविद डॉ|कपूरमल जी जैन कहते हैं कि 2011 -12 की योजनाओं के अच्छे परिणामों के बाक़ायदा दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध हैं|पर वे क्यों लागू नहीं है,मालूम नहीं|यही नहीं वे यह भी बताते हैं कि ‘गुणवत्ता-वर्ष’के उत्साहजनक परिणामों को देखकर वर्ष 12 -13 को ‘गुणवत्ता-विस्तार-वर्ष’के रूप में मनाया जाना तय हुआ था|कुछ कमी-बेशी कर फिर 2014 में गुणवत्ता का स्मरण आया था|ये सब बातें सरकार के संकल्पों के रूप में बाक़ायदा छपी रखी हैं व वेब साइट पर टंगी भी हैं,पर जमीन पर नहीं हैं|

सरकार में बैठे जिम्मेदारों से कैसे कहें कि कालेज खोलने और दूकान खोलने में फरक है|इन्हीं से निकले विद्यार्थी,जो हमारे ही बच्चे हैं,कल विश्व की कठिन प्रतियोगिता शामिल होंगे|विकास के वादे और दावे अपनी जगह हैं,लेकिन हकीकत से कुछ तो मिलता जुलता हो|

-कमलेश पारे

  (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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