रास्ता साफ हैं, बस ज़रूरत है मौका पसारने की

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प्रख्यात पत्रकार, लेखक, संपादक, विचारक, राजनीतिक-सामाजिक कबीरपंथी निशानेबाज आदरणीय शंभुनाथ शुक्लजी का भी जवाब नहीं, ऐसा कसकर तंज मारते हैं कि तबीयत हरी हो जाती है । उनका ताजा स्वर्ण पदक विजेता तीर कुछ इस तरह सन्न करता निकला| उन्होंने कहा, “आपके त्याग की महिमा तभी है, जब आप चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा हुए हों। आपका बाप हाईकोर्ट का जज, वक़ील, टॉप क्लास डॉक्टर, आईआईटी से पास इंजीनियर आदि हो।

हम जैसे मज़दूरों की संतान तो सदैव लुम्पेन ही कही जाएगी और प्रोलेतेरियत की भांति हर समय लड़ाई में गोली खाने को भेजी जाएगी। नारा लगाओ-प्रोलेतेरियत ज़िंदाबाद! सर्वहारा अमर रहे! बाक़ी हम जैसों को 24, अकबर रोड स्थित कांग्रेस मुख्यालय में चाय का ढाबा खोलने का काम दिलाने की बात मणिशंकर अय्यर कर ही चुके हैं।

हर एक्शन का रिएक्शन होना तो ज़रूरी है|” मैंने भी उनके तीर की नोंक में गुदगुदाने वाले लेप को गरम करके इस तरह छौंक दिया, ”मजेदार विषय कुरेदा है श्रीमान आपने” बलराम जाखड़ जब मप्र के राज्यपाल बने तो उनके खेतों में जो सरकारी कृषि विस्तार अधिकारी खुद आकर फसलों पर कीटनाटक छिडकता था, उसे कुलपति बना दिया गया|

दूसरा आदमी, जो उनकी गायों की मालिश करता था, उस सरकारी वेटरनरी डॉक्टर को भी मप्र के एक प्रतिष्ठित विवि में कुलपति बना दिया गया। ऐसा भी सुना है कि यदि कोई प्रधानमंत्री के घर रसोई का काम करे और गरमा-गरम रोटियां सेंककर खिलाए तो ‘राष्ट्रपति’ भी बनाया जा सकता है। यानी यों कहें कि रास्ता साफ हैं, बस ज़रूरत है मौका पसारने की| सही बात है न, अब तो बोलिए| चरखा, बैल-जोड़ी, गाय-बछड़ा और अब सबको बाय-बाय करते हुए हाथ के पंजे वाली…भारत माता की जय।

डॉ.राम श्रीवास्तव (drramshrivastava@gmail.com)

(लेखक वैज्ञानिक और समीक्षक हैं)

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