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अगले पांच साल लोकतंत्र की दशा-दिशा कैसी होगी ? 

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यदि इस 2019 के चुनाव में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिल जाए और एक स्थिर सरकार बन जाए तो भारतीय लोकतंत्र के लिए इससे बढ़िया बात तो कोई हो ही नहीं सकती। वह सरकार पिछले पांच साल की सरकार से बेहतर होगी, ऐसी आशा हम सभी कर सकते हैं। एक तो वह अपनी भयंकर भूलों से सबक लेगी। दूसरे, इस बार विपक्ष जरा मजबूत होगा। वह भी कान खींचने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। इस दूसरी अवधि में प्रचार मंत्रीजी प्रधानमंत्री बनने की पूरी कोशिश करेंगे।

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जहां तक विपक्षी दलों का सवाल है, उनके धुआंधार और आक्रामक प्रचार के बावजूद किसी दल ने ऐसा दावा करने की हिम्मत तक नहीं की है कि वह सरकार बना पाएगा। ऐसा दावा तो जाने दीजिए, किसी ने यह भी नहीं कहा कि वह सबसे बड़ा दल बनकर उभरेगा। यदि सारे विरोधी दल मिलकर बहुमत में आ जाएं तो आश्चर्य नहीं होगा। हो सकता है कि भाजपा को 200 के आसपास सीटें मिलें और 2014 की तरह अपने दम पर सरकार बनाने में वह सफल न हो। ऐसे में क्या होगा ? ऐसे में भारतीय लोकतंत्र की कमान मोदी या राहुल या ममता या मायावती के हाथ में नहीं होगी। वह होगी, भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हाथों में। जब किसी का भी स्पष्ट बहुमत नहीं होगा तो वे किसी को भी प्रधानमंत्री की शपथ दिला सकते हैं और उसे एक सप्ताह या एक माह का समय दे सकते हैं कि वह लोकसभा में अपना बहुमत सिद्ध करे।

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वे ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री की शपथ दिलवाना चाहेंगे, जो लोकसभा में अपना बहुमत सिद्ध कर सके और बाद में पांच साल तक सरकार चला सके। यह ज़रूरी नहीं है कि वह सबसे अधिक सीटें जीतनेवाली पार्टी के नेता को ही यह मौका दें। वे कह सकते हैं कि आप तो हारे हुए हैं, जनता द्वारा रद्द किए हुए हैं। आपको दोबारा मौका क्यों दूं ? बासी कढ़ी को चूल्हे पर फिर क्यों चढ़ाऊं ?  उस पार्टी के नेता राजीव गांधी की तरह खुद ही प्रधानमंत्री की दौड़ से बाहर भी हो सकते हैं। ऐसे में उस पार्टी के किसी दूसरे नेता को मौका देने के बात भी राष्ट्रपति सोच सकते हैं।

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राष्ट्रपति कम सीटोंवाली किसी अन्य पार्टी के नेता को भी शपथ दिला सकते हैं और उससे सदन में शक्ति-परीक्षा करवा सकते हैं, जैसे कि भाजपा के अटलबिहारी वाजपेयी को राष्ट्रपति डॉ.शंकरदयाल शर्मा ने मौका दिया था।

तात्पर्य यह कि अस्पष्ट बहुमत की स्थिति में राष्ट्रपति का पद, जिसे ध्वजमात्र समझा जाता है, सबसे अधिक महत्वपूर्ण और शक्तिशाली बन जाता है। उनका स्वविवेक ही यह तय करेगा कि अगले पांच साल में भारत के लोकतंत्र की दशा और दिशा कैसी होगी ?

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं)  

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