अटलजी : वे थे बेजोड़ नेता

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अटलजी के निधन पर मैं क्या लिखूं, कैसे लिखूं ? अटलजी से मेरा 50-55 साल का संबंध रहा है। वे जब भी इंदौर आते, हमारे घर उनका भोजन पहले से तय होता। मेरे पिताजी और अटलजी, दोनों ही जनसंघ के प्रारंभिक कार्यकर्ता थे। मैं 1965 में पीएच.डी. करने के लिए दिल्ली आ गया और तब से अब तक अटलजी से आत्मीय घनिष्टता ज्यों की त्यों बनी रही। वे मेरी शादी में (1970) देश के अन्य नेताओं के साथ बड़े सम्मानीय बाराती रहे।

विदेश मंत्री के तौर पर अटलजी ने मुझे राजदूत पद लेने को कहा, प्रधानमंत्री के तौर पर उन्होंने मुझे मंत्रिपद पर बिठाने का आग्रह किया, इंदौर से कई बार मुझे लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित किया लेकिन मैंने, अब से 61 साल पहले जब मुझे पहली बार जेल हुई थी, संकल्प कर लिया था कि मैं किसी भी राजनीतिक दल में शामिल नहीं होऊंगा। जब मैंने 1965-66 में इंडियन स्कूल आॅफ इंटरनेशनल स्टडीज में अपना पीएच.डी. का शोधग्रंथ हिंदी में लिखने का आग्रह किया तो कई बार संसद बंद हो गई। देश में बहुत हंगामा हुआ। अटलजी, दीनदयालजी और गुरु गोलवलकरजी ने मेरा डटकर समर्थन किया।

उस समय डाॅ. लोहिया, मधु लिमये और भागवत झा आजादजी ने अग्रगण्य भूमिका निभाई। आज मुझे अटलजी से संबंधित सैकड़ों संस्मरण याद आ रहे हैं। उन पर कभी और लिखूंगा। लेकिन आज तो मैं यही कहना चाहूंगा कि अटलजी देश के चार बड़े प्रधानमंत्रियों में गिने जाएंगे। नेहरुजी, इंदिराजी, नरसिंहरावजी और अटलजी । अटलजी ने परमाणु-विस्फोट करके भारतीय संप्रभुता का विश्व-नाद किया। उन्होंने विरोधी नेता के रुप में देश के जितने करोड़ों लोगों को अपने रोचक भाषणों से संबोधित किया, देश के किसी अन्य नेता ने नहीं किया। वे सच्चे हिंदुत्ववादी थे। वे संकीर्ण और सांप्रदायिक बिल्कुल नहीं थे।

वे ‘सत्यार्थ प्रकाश’ और ‘दास केपिटल’ को एक साथ रखकर पढ़ने के पक्षधर थे। वे महर्षि दयानंद और आर्यसमाज के भक्त थे। उन्होंने भाजपा के अध्यक्ष के नाते 1980 में ‘गांधीवादी समाजवाद’ का नारा दिया था। 2002 में गुजरात के दंगों के समय उन्होंने मेरे एक लेख के शब्दों को बार-बार दोहराया कि गुजरात में ‘राजधर्म का पालन’ किया जाए। उन्होंने करगिल का युद्ध जमकर लड़ा लेकिन उन्होंने पाकिस्तान से संबंध-सुधार करने की भरपूर कोशिश की। उनके निधन पर पड़ौसी देशों ने जैसा शोक-व्यक्त किया है, शायद किसी भी प्रधानमंत्री के लिए नहीं किया है। वे भारत के अनुपम नेता थे। वे यदि प्रधानमंत्री नहीं बनते तो भी उन्हें यही सम्मान मिलता।

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं)

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