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तालिबान से भारत बात करे

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अफगान समस्या का हल करने के लिए अमेरिका आजकल पूरा जोर लगा रहा है। अमेरिकी सरकार के विशेष दूत जलमई खलीलजाद कई महीनों से काबुल, दोहा, दिल्ली और इस्लामाबाद के चक्कर लगा रहे हैं। खलीलजाद यों तो मूलतः अफगान हैं, लेकिन अमेरिकी नागरिक हैं। वे काबुल में अमेरिकी राजदूत भी रह चुके हैं। वे मुझसे न्यूयार्क, दिल्ली और काबुल में कई बार मिल चुके हैं। इस समय उनका मुख्य लक्ष्य अफगान-समस्या का हल करना नहीं है बल्कि अमेरिका का अफगानिस्तान से पिंड छुड़ाना है।

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पिछले 18 साल से अमेरिकी फौजें अफगानिस्तान में कट-मर रही हैं और करोड़ों-अरबों डॉलर अमेरिका वहां लुटा चुका है, लेकिन शांति के कोई आसार नज़र नहीं आ रहे हैं। खुद अफगानिस्तान लगातार खाली होता जा रहा है। उसकी आर्थिक हालत खस्ता है। ज्यादातर जिलों में तालिबान का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है। अमेरिकी सरकार आजकल तालिबान से जमकर बात कर रही है। कतर की राजधानी दोहा में उनसे संवाद के कई दौर हो चुके हैं। खलीलजाद उनसे और काबुल की अशरफ गनी सरकार से अलग-अलग बात कर चुके हैं, लेकिन उन सबको एक साथ बैठाकर बात करवाना संभव नहीं हो पा रहा है क्योंकि तालिबान का कहना है कि अशरफ गनी सरकार अमेरिका की कठपुतली है।

जब अमेरिका से सीधे बात हो रही है तो उसकी कठपुतली से क्यों बात की जाए ? अफगान सरकार ने पिछले हफ्ते ‘लोया जिरगा’ (महापंचायत) का अधिवेशन बुलाया था। उसमें देश भर के 3200 प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। तालिबान ने उसका बहिष्कार कर दिया। उसमें (प्रधानमंत्री) डॉ.अब्दुल्ला अब्दुल्ला भी नहीं आए। रमजान के दिनों में युद्ध-विराम की जिरगा की अपील को तालिबान ने रद्द कर दिया।

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विशेष दूत खलीलजाद भारत आकर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से मिले। भारत का कहना है कि अफगान सरकार को बातचीत में शामिल किया जाए। भारत सरकार की यह मांग तो ठीक है, लेकिन तालिबान को अछूत समझकर उनसे दूरी बनाए रखने का रवैया ठीक नहीं है। पिछले 25 साल में तालिबान नेताओं से मेरा सीधा संपर्क रहा है। वे भारत के दुश्मन ही हैं, यह मानना ठीक नहीं है। उन्हें पाकिस्तान का एजेंट मानकर चलना भी ठीक नहीं है। तालिबान गिलजई पठान हैं, स्वाभिमानी हैं और मूलतः आज़ाद मिजाज के लोग है। यदि हमारी सरकार उनसे सीधा संपर्क बनाकर रखती तो वह अफगान-संकट को सुलझाने में अमेरिका से ज्यादा सफल होती। हम दक्षिण एशिया की महाशक्ति होने की डींग तो मारते हैं लेकिन उस दिशा में कोई पहल नहीं करते।

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-डॉ. वेदप्रताप वैदिक

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं )

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