प्लास्टिक सारी मनुष्यता का सबसे बड़ा दुश्मन

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प्लास्टिक सारी मनुष्यता का कितना बड़ा दुश्मन है, इसकी कल्पना हमें ज़रा भी नहीं है। पिछले पचास-पचपन साल में प्लास्टिक के बर्तनों, थैलियों, लिफाफों, खिलौनों, उपकरणों आदि ने सरी दुनिया पर कब्जा कर लिया है। क्या नालियां, क्या नदियां, क्या तालाब और क्या समुद्र सभी जगह प्लास्टिक तैरता हुआ दिखाई पड़ता है। उसे निगलने पर सामुद्रिक जीव तो मरते ही हैं, पशु-पक्षी भी मौत के घाट उतरते हैं। मनुष्य समझता है कि वह सब जीवों में सबसे समझदार है और चालाक है, लेकिन प्लास्टिक के बर्तनों और थैलियों की कृपा से वह कैंसर, सिरोसिस और फेफड़ों की बीमारियों का शिकार होता चला जा रहा है, लेकिन फिर भी वह प्लास्टिक की चीजों का इस्तेमाल बड़े शौक से करता रहता है।

राष्ट्रपति बोले तो अच्छा लेकिन…?

अकेले भारत में प्लास्टिक उद्योग 2.25 लाख करोड़ रु. का है और इसमें 45 लाख लोग लगे हुए हैं। जरा कल्पना कीजिए कि अमेरिका और यूरोप के देशों में यह उद्योग कितना बड़ा होगा। यह उद्योग जितना बढ़ता चला जाएगा, दुनिया में न सिर्फ असाध्य रोग बढ़ते रहेंगे बल्कि प्लास्टिक का भंडार इतना बड़ा हो जाएगा कि लोगों का जीन दूभर हो जाएगा। नदी, नाले और समुद्र सूखने लगेंगे। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, जीव-जन्तु मरने लगेंगे। ऐसे में क्या किया जाए ? सबसे पहले तो सरकार को प्लास्टिक-निर्माण पर कड़ा प्रतिबंध लगाना चाहिए। प्लास्टिक के सिर्फ वे ही बर्तन या उपकरण बनाने दिए जाएं, जिनका खाने-पीने या पहनने में इस्तेमाल न हो। जो भी दुकानदार अपना माल प्लास्टिक की थैलियों में ग्राहकों को देते हैं, उन पर जुर्माना और सज़ा, दोनों हों। इसके अलावा वोट और नोट के गुलाम राजनीतिक दलों को अपने लाखों कार्यकर्ताओं को इस प्लास्टिक-त्याग अभियान में जुटा देना चाहिए।

एक साथ चुनाव ही सर्वश्रेष्ठ

पंजाब के मुक्तसर नगर में कई समाजसेवियों ने एक अभियान चलाया है, जिसके तहत वे दुकानदारों को सिर्फ 5 रु. में कपड़े की थैली दे देते हैं ताकि वह ग्राहकों को दी जा सके और वे हमेशा के लिए प्लास्टिक की थैलियों से मुक्त हो सकें। कुछ लोगों ने अपने घरों में स्टील की बड़ी-बड़ी थालियां सैकड़ों की संख्या में रख रखी हैं, जिन्हें वे मुफ्त में इस्तेमाल करने के लिए दे देते हैं ताकि शादी-ब्याह की पार्टियों में प्लस्टिक की प्लेटों का इस्तेमाल रुके। इस तरह के कई अभियान देश में एक साथ चलना चाहिए। हम चाहें तो 2019 को प्लास्टिक-मुक्ति वर्ष के रूप में घोषित कर सकते हैं |

क्यूबेक का अजीब कानून

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं )

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