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अयोध्या-विवाद का हल यह है

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सर्वोच्च न्यायालय ने राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद (Ram Mandir Babri Masjid Dispute) को फिर अधर में लटका दिया है। उसने 15 अगस्त तक यानी मध्यस्थों को तीन महीने का समय और दे दिया है। पिछले दो माह में वे कहां तक पहुंचे हैं, यह अदालत के अलावा किसी को पता नहीं है। उन्होंने अदालत को एक गोपनीय रपट दी है। अदालत को लगा होगा कि इन मध्यस्थों ने कुछ काम की बात की है इसीलिए इन्हें एक मौका और दे दिया जाए। यदि ऐसा है तो बहुत अच्छा है, लेकिन मंदिरवादियों का मानना है कि अदालत सारे मामले को टाले जा रही है।

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राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्व के इस ऐतिहासिक मामले को सर्वोच्च न्यायालय में आए 10 साल हो गए और वह अभी तक इसे लटकाए हुए है, इसका क्या मतलब निकाला जाए ? अगर अदालत सिर्फ कानूनी दलीलों के आधार पर फैसला करेगी तो उस फैसले को कौन मानेगा ? इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2010 में राम जन्मभूमि की पौने तीन एकड़ जमीन तीन पक्षकारों को बांट दी थी, लेकिन उनमें से कोई भी उसे लेने को तैयार नहीं हैं। अगर मान लें कि वे तैयार हो जाएं तो क्या करोड़ों लोग उनकी हां में हां मिला देंगे ? क्या वे राम या बाबर के प्रतिनिधि हैं या वारिस हैं ? यदि अदालत अपने फैसले को लागू करवाने पर जोर देगी और कोई सरकार उसे हर कीमत पर लागू करना चाहेगी तो देश में कोहराम मचे बिना नहीं रहेगा इसलिए इस मामले का फैसला आपसी संवाद और समझ से ही होना चाहिए।

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यह फैसला सिर्फ उन तीन याचिकाकर्त्ताओं के बीच मध्यस्थता करने से नहीं होगा। इस समय न तो वे याचिकाकर्ता और न ही ये तीनों मध्यस्थ व्यापक समाज याने देश के हिंदुओं और मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसके अलावा मैं पूछता हूं कि इन मध्यस्थों या सर्वोच्च न्यायालय के दिमाग में मंदिर-मस्जिद विवाद को सुलझाने के कोई ठोस विकल्प हैं, क्या ? नहीं हैं। अदालत और ये मध्यस्थ हवा में लट्ठ घुमा रहे हैं।

मेरी राय में 1993 में जो विकल्प हमने सुझाया था, वह सर्वस्वीकार्य हो सकता है। प्रधानमंत्री नरसिंहरावजी की कल्पना थी कि उस 70 एकड़ जमीन में भव्य राम मंदिर के साथ-साथ अन्य धर्मों के पूजागृह भी बनें, सर्वधर्म संग्रहालय आदि बनें। अयोध्या युद्धविहीन विश्व का प्रतीक बने। यदि 6 दिसंबर 1992 को मस्जिद का वह ढांचा नहीं टूटता तो मुझे सभी पक्षों से बातचीत के बाद यह विश्वास हो चला था कि इस विवाद का सर्वसम्मत हल निकल सकता है। यह तो अब भी संभव है, लेकिन इसमें नई सरकार को सक्रिय होना होगा।

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-डॉ. वेदप्रताप वैदिक

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं)

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