अपना और पाक दोनों का नुकसान कर रहा चीन

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अमरीका (America) का ट्रंप (Donald Trump) प्रशासन कमाल कर रहा है। उसने जैश-ए-मोहम्मद पर संयुक्त राष्ट्र संघ से प्रतिबंध लगवाने की ठान रखी है। ऐसा लगता है कि जिसने दर्द दिया वही दवा भी देगा। अफगानिस्तान में सोवियत रूस का मुकाबला करने के लिए 30-35 साल पहले अमेरिका ने पाकिस्तान (Pakistan) को आतंकवाद का गढ़ बना दिया था। उसका खामियाजा ईरान से लेकर भारत तक सभी देश भुगत रहे थे। स्वयं अमरीका और पाकिस्तान भी उसके शिकार बन गए। अब ट्रंप प्रशासन सीधे सुरक्षा परिषद में जैश-ए-मुहम्मद पर प्रतिबंध का  प्रस्ताव ला रहा है। संयुक्त राष्ट्र की आतंकवाद विरोधी कमेटी में यह प्रस्ताव चार बार गिर चुका है सिर्फ चीन के विरोध के कारण !

मार्गदर्शक बन गए मूकदर्शक

इस कमेटी में सर्वसम्मति से फैसले होते हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में यदि चीन ने वीटो किया या वह तटस्थ रहा तो प्रतिबंध की घोषणा हो जाएगी। यदि चीन ने यहां भी वीटो किया तो उसे उसकी सफाई देनी होगी। यह सफाई चीन की छवि खराब कर देगी। अमरीका, फ्रांस और ब्रिटेन के संयुक्त दबाव के कारण चीन (China) कुछ नरम पड़ा था। उसने मांग की थी कि यदि भारत पाकिस्तान के साथ संवाद शुरु करे और उसके विरुद्ध अपनी फौजी तैयारी रोके तो वह प्रतिबंध का समर्थन कर सकता है, लेकिन भारत यह कैसे कर सकता है ?

जबरन धर्मांतरण और इमरान

पाक सरकार ने पुलवामा हमले पर जांच का जो दस्तावेज भारत ने दिया था, उसे रद्द कर दिया है। उसने कहा है कि पुलवामा कांड में पाक का कोई हाथ नहीं है और पाक में 22 आतंकवादी शिविरों के चलने की बात झूठी है। इमरान सरकार खुद बड़ी दुविधा में फंसी हुई है। वह आतंकवाद को पूरी तरह खत्म करने की घोषणा करती है और शायद तहेदिल से वह यह चाहती भी होगी लेकिन पाक फौज के सामने वह निढाल है। पाकिस्तान में अपनी फौज और चीन, इन दोनों की चल रही है, इमरान की नहीं। इमरान का यह कहना कितना हास्यास्पद है कि उन्हें पता ही नहीं कि चीन के उइगर मुसलमानों पर चीन कोई अत्याचार कर रहा है या नहीं ? चीन ने 10 लाख उइगरों को कैद कर रखा है और दाढ़ी-मूंछ व मस्जिदों की भीड़ पर प्रतिबंध ठोक रखा है इस्लामी आतंकवाद खत्म करने के नाम पर। उसी आतंकवाद की रक्षा वह पाकिस्तान में कर रहा है। वह अपना और पाकिस्तान दोनों का नुकसान कर रहा है। यह सही समय है, जब चीन को अपने हठधर्मी छोड़ देनी चाहिए।

अज़हर पर चीन का रवैया

-डॉ.वेदप्रताप वैदिक

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं)

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