किस मुंह से भटके हुए नौजवानों को सिखाएं

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दिल्ली के कितने नौजवान शराबखोरी करते हैं, यह जानने के लिए एक शराब-विरोधी संस्था ने दिल्ली के 10 हज़ार युवक-युवतियों से पूछताछ की। ये नौजवान कोई मजदूर के बच्चे नहीं थे। न ही गंदे गली-कूचों या झोपड़ों में रहनेवालों के बच्चे थे। ये लोग थे दिल्ली के शानदार और मालदार इलाकों में रहने वाले नौजवान !

साउथ एक्सटेंशन, डिफेंस कॉलोनी, न्यू फ्रेंडस कॉलोनी और राजौरी गार्डन जैसे मोहल्लों के होटलों और शराबखानों में जाने वाले युवजनों से पूछा गया था कि आप शराब पीते हैं या नहीं और यदि पीते हैं तो कब से पीनी शुरू की है। मालूम पड़ा कि 65 प्रतिशत लड़कों ने कहा कि वे पीते हैं। इन 65 प्रतिशत में से 89 प्रतिशत ने कहा कि उन्होंने 25 साल की उम्र के पहले ही पीना शुरू कर दिया था। कुल 11 प्रतिशत लोग ऐसे थे, जिन्हें पीने की यह लत 25 साल की उम्र होने के बाद लगी यानी छोटी उम्र के नौजवान जरा जल्दी फिसलते हैं।

यदि संस्कार मजबूत हों तो छोटी उम्र में नशाखोरी, दुराचार और अपराधों से बचना कठिन नहीं होता। इनमें से 20 प्रतिशत जवानों ने बताया कि उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों की जानकारी और मदद से शराबखोरी शुरू की। सर्वेक्षण करनेवाली इस संस्था को यह भी जानने की कोशिश करनी चाहिए थी कि लोग शराब पीना या नशा करना शुरू क्यों करते हैं ? नशाबंदी के खिलाफ देश में जबर्दस्त आंदोलन चलना चाहिए। सर्वोदय, आर्य समाज, स्वाध्याय जैसी संस्थाएं पता नहीं क्यों चुप पड़ी हुई हैं। इन्होंने लाखों लोगों को नशामुक्त किया है। मैं भी काफी सक्रिय हूं। मैं जिन मुस्लिम देशों में जाता हूं, वहां अपनी सभाओं और संगोष्ठियों में लोगों से नशाबंदी की प्रतिज्ञा करवाता हूं।

नीतीशकुमार ने बिहार में जब नशाबंदी की तो मैंने उन्हें बहुत सराहा और उन्हें कुछ नए सुझाव भी दिए, जो उन्होंने तुरंत लागू कर दिए। हमारे राजनीतिक दल तो इस मामले में आंख मींचे रहते हैं। गांधीजी के जमाने में कांग्रेस की कार्यसमिति में कोई शराबखोर सदस्य नहीं रह सकता था, लेकिन अब सभी पार्टियों के कई बड़े-बड़े नेता भी बेझिझक शराबखोरी करते रहते हैं। उन पर सत्ता और प्रचार का नशा तो पहले से चढ़ा ही रहता है, दारुकुट्टई उन्हें इंसान भी नहीं बने रहने देती। अब हम किस मुंह से इन भटके हुए नौजवानों को बरजें ?

-डॉ.वेदप्रताप वैदिक

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं)

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