इमरान के कहे पर पानी फिरा

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गुरुनानक बरामदे के शिलान्यास के अवसर पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने जो चमत्कारी भाषण दिया, उस पर पानी फिर गया है। हमने अगले दक्षेस सम्मेलन के बहिष्कार की घोषणा कर दी और यह भी कह दिया कि जब तक आतंकवाद खत्म नहीं होगा, हम कोई बात नहीं करेंगे। हमारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की यह प्रतिक्रिया निराधार नहीं है। उनका गुस्सा स्वाभाविक है। हमारे प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री दोनों पाकिस्तान जाने की दरियादिली दिखा चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों के बीच कोई संवाद नहीं है। हमारे प्रधानमंत्री ने अपनी ‘फर्जीकल स्ट्राइक’ का खूब प्रचार किया, लेकिन उसके बावजूद सैकड़ों बार हमारी सीमा का उल्लंघन हुआ है।

क्या इमरान खान इतना भी नहीं कर सकते कि अपनी सेना से कहें कि अगले छह महीने तक नियंत्रण रेखा और अन्तरराष्ट्रीय सीमा का एक बार भी उल्लंघन न हो ? यही काम भारतीय फौज भी करे। जहां तक आतंकवाद का सवाल है यदि पाकिस्तान की सरकार और फौज दोनों ही भारत से वादा कर ले तो भी वे आतंकवाद को नहीं रोक सकते। यदि वे रोक सकते होते तो वे पहले अपने यहां ही रोक लेते।

आतंकवादियों ने पिछले पांच साल में जितने लोग भारत में मारे हैं, उससे ज्यादा पाकिस्तान में मारे हैं। भारत सिर्फ कश्मीरी आतंकवादियों से तंग है, लेकिन पाकिस्तान में बलूच, पठान, सिंध, अफगान और पंजाबी आतंकवादों का भी जहरीला इंद्रधनुष तना हुआ है। ऐसे में आतंकवाद को बातचीत न करने का कारण बनाना कहां तक व्यावहारिक है ? हमारे यहां तो महाभारत काल से परंपरा रही है कि सूर्योदय से सूर्यास्त तक युद्ध और उसके बाद संवाद ! ‘बात नहीं’ की जिद करने वाले क्या भगवान कृष्ण और भीष्म-द्रोणाचार्य से भी बड़े हैं ?

क्या उनसे हमें कोई सीख नहीं लेनी चाहिए ? कश्मीर के सवाल पर पाकिस्तान से ज्यादा भारत को जोर देना चाहिए। उसे पाकिस्तानी कब्जे के कश्मीर को बातचीत का पहला मुद्दा बनाना चाहिए, लेकिन हमारे बेचारे नेताओं को पता ही नहीं है कि उसके बारे में संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव में क्या लिखा है ? इमरान ने फ्रांस और जर्मनी की मिसाल देकर दोस्ती का जो हाथ बढ़ाया है, वह आज नहीं तो कल तो होना ही है।

नानक बरामदे के शिलान्यास-समारोह में सेनापति क़मर बाजवा का शामिल होना अपने आप में एक अच्छा संकेत है। फौज भी उनके साथ है, इमरान का यह कहना काफी वजनदार है। लेकिन हमारी सरकार आजकल चुनावी चश्मा धारण कर चुकी है। इसमें नोट और वोट के अलावा कुछ नहीं दिखाई पड़ता है। ऐसे में हमारी सरकार की मजबूरी समझ में आती है,  लेकिन हमारी सरकार चाहती तो इमरान की जलेबियों के जवाब में इमरतियां तो परोस ही सकती थीं।

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं)

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