रिश्वतप्रेमी और रिश्वतद्रोही

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संसद ने अब एक ऐसा कानून पास कर दिया है, जिसके कारण रिश्वत लेना ही नहीं, देना भी जुर्म होगा। 1988 में जो भ्रष्टाचार-विरोधी कानून पास हुआ था, वह लंगड़ा था। उसकी एक टांग गायब थी। वह कानून रिश्वत लेनेवालों को तो सजा देता था, लेकिन देनेवाला बिल्कुल मुक्त होता था। इस तरह का कानून यह मानकर चलता है कि कोई भी आदमी रिश्वत तभी देता है, जब वह भयंकर मजबूरी में फंस जाता है। लोगों को अपने सही काम करवाने के लिए भी रिश्वत देनी पड़ती है। उनको सज़ा देकर उन पर दोगुना जुल्म क्यों किया जाए ? कुछ हद तक यह तर्क ठीक है, लेकिन भारत में तो भ्रष्टाचार ही एक तरह का शिष्टाचार बन गया है।

ज्यादातर लोग अपने गैर-कानूनी काम करवाने के लिए ही रिश्वत देने का शिष्टाचार निभाते हैं। वे रिश्वत देने के ऐसे-ऐसे तरीके निकालते हैं कि ईमानदार से ईमानदार अफसर को भी फिसलते देर नहीं लगती। दूसरे शब्दों में असली गुनाहगार रिश्वत देनेवाला होता है, जो अपने गलत काम करवाने के चक्कर में अफसरों को भ्रष्ट कर देता है। ऐसे रिश्वत देने वालों को अब नए कानून के मुताबिक जुर्माने के अलावा 7 साल तक की सजा भी हो सकती है।

यदि रिश्वत देने वाला सात दिन में उस रहस्य को खोल दे और पुलिस में रपट कर दे तो उसे अपराधी नहीं माना जाएगा। ऐसी रपट वही करेगा, जिसे अपने सही काम के लिए भी मजबूरी में रिश्वत देनी पड़ी होगी। ऐसी रपट लिखवाकर कितने लोग नया सिरदर्द मोल लेना चाहेंगे ? अब इस कानून की वजह से रिश्वतखोरी के इस अनिवार्य व्यवसाय में दोनों पक्ष ज्यादा सावधानी बरतेंगे ताकि कोई प्रमाण पकड़ा न जाए। असली ज़रूरत तो ऐसे कठोर और बारीक कानून-कायदों की है कि उनमें कोई हेराफेरी करना संभव ही न हो।

रिश्वत या रिश्तेदारी या राजनीतिक दबाव भी बेकार सिद्ध हो जाए। पिछले कानून में सिर्फ संयुक्त सचिव के पद और उसके ऊपर के अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए सरकार की अनुमति आवश्यक थी। अब ऐसी अनुमति सभी कर्मचारियों के लिए ज़रूरी हो गई है। क्या इससे रिश्वतखोरी को बढ़ावा नहीं मिलेगा ? अफसर रिश्वतखोरी प्रायः इसलिए भी करते हैं कि उनके मंत्री, सांसद, विधायक आदि भी डटकर रिश्वत खाते हैं। जब मालिक रिश्वतप्रेमी हो तो नौकर रिश्वतद्रोही कैसे हो सकता है ?

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं)

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