हिंसक भीड़ हो या आतंकवाद किसी का हिस्सा न बनें

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मूलतः मनुष्य की दो मानसिकताएं होती हैं – एक व्यक्तिगत और दूसरी सामूहिक । व्यक्तिगत हम एक अलग इंसान हैं और सामूहिक एक बिल्कुल अलग इंसान। हम व्यक्तिगत रूप से हिंसा के विरोधी हो सकते हैं, लेकिन भीड़ के साथ हम हिंसा पर उतारू और क्रोध तथा बदले से भरे व्यक्ति बन जाते हैं। एकांत में आप एक ऐसे व्यक्ति हो सकते हैं, जो कि किसी भी धर्म से घृणा नहीं करता, लेकिन भीड़ में आप दूसरे धर्म वाले व्यक्ति को मौत के घाट उतार सकते हैं चाहे आप उसे जानते भी न हो, चाहे उसने आपका कुछ न बिगाड़ा हो, चाहे वह व्यक्ति निर्दोष हो, चाहे वह व्यक्ति किसी षडयंत्र के द्वारा फंसाया गया हो, लेकिन आप उस पर हिंसक भीड़ बनकर टूट पड़ते हैं, क्यों ? क्योंकि भीड़ में आप एक अलग इंसान बन गए हैं, एक अलग रूप आपने ग्रहण कर लिया है, एक नए रोल में आप आ गए हैं, आप अपनी पहचान भूल गए हैं।

हमारे देश में आजकल भीड़ के न्याय और ‘आन स्पॉट सजा’ का बोलबाला है। दिल्ली में एक युवक की भीड़ ने पीट-पीटकर इसलिए हत्या कर दी कि वह खुले में मूत्र कर रहा था, राजस्थान में एक व्यक्ति को इसलिये मार दिया गया कि वह गाय खरीदकर ले जा रहा था जबकि उसका उद्देश्य उसे काटना नहीं पालना था, झारखंड में छः युवकों को भीड़ ने बच्चा चोरी के शक में पीट-पीटकर मार डाला। यूपी में एक व्यक्ति को भीड़ गोकशी की अफवाह के कारण निर्दयता से मार डालती है। महाराष्ट्र के धुले में हिंसक भीड़ ने 5 लोगों को पिट पीटकर इसीलिए मार दिया क्योंकि वे एक छोटी बच्ची से गांव के हाट में किसी का पता पूछ रहे थे और लोगों को लगा कि वे बच्चों को चोरी करने वाली गैंग है।

यह भीड़ कभी भी उत्पन्न हो सकती है और किसी के भी खिलाफ हो सकती है। हो सकता है यह भीड़, हिन्दुओं की मुसलमान के खिलाफ हो, या मुसलमानों की हिन्दुओं के खिलाफ हो, या दलित की सवर्णों के खिलाफ,या सवर्णों की दलितों के खिलाफ, या यह भीड अमीर की गरीब के खिलाफ, या गरीब की अमीर के खिलाफ, या यह भीड़ डॉक्टरों के खिलाफ मरीज की हो, या यह भीड़ पुलिस के खिलाफ भी हो सकती है, या नेताओं के खिलाफ, या बोस के खिलाफ, या महिलाओं के खिलाफ, या पुरूषों के खिलाफ, या दूसरी भाषा बोलने वाले की हो सकती है, या यह भीड़ एक राज्य के खिलाफ दूसरे राज्य वालों की हो सकती है, या एक गांव या शहर वालों की दूसरे गांव या शहर वालों के खिलाफ हो सकती है।

भीड़ के समर्थकों के खिलाफ भी कोई अन्य या नई भीड़ खड़ी होकर उसको वही सज़ा देकर मौत के घाट उतार सकती है। यह केवल अल्पसंख्यक के खिलाफ ही हो, ऐसे किसी सिद्धान्त पर ये नहीं चलती। और हमारा देश तो ऐसा निराला देश है कि आप एक पल में बहुसंख्यक हैं तो दूसरे पल अल्पसंख्यक बन जाते हैं। आपकी भाषा, विचारधारा, क्षेत्र, धर्म, जाति, लिंग और आयु किसी भी समय आपको अल्पसंख्यक बना सकती है।

आप एक मोहल्ले में बहुसंख्यक हैं तो दूसरे मोहल्ले में अल्पसंख्यक, आप एक गांव में बहुसंख्यक है तो दूसरे गांव में अल्पसंख्यक, आप एक शहर में बहुसंख्यक हैं तो दूसरे शहर में अल्पसंख्यक, आप एक राज्य में बहुसंख्यक है तो दूसरे राज्य में अल्पसंख्यक।

हमारे नेताओं और राजनीतिक पार्टियों को भीड़ बहुत पंसद होती है क्योंकि ये उनकी ऊर्जा होती है और थोक में वोट करती है। भीड़, असल में डरी हुई भी होती है और भीड़ अपने व्यक्तिगत मसलों को भूलकर सामुहिक मुद्दों पर वोट करती है, लेकिन स्वार्थी नेता ज्यादा महत्वपूर्ण वोट बैंक के आगे कम महत्वपूर्ण वोटर्स के समुह को बर्बाद कर देंगे। हो सकता है आप अभी महत्वपूर्ण वोटर हो लेकिन आपका धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र आयु, लिंग और विचारधारा आपको किसी भी वक्त कम महत्वपूर्ण वोटर या अल्पसंख्यक में परिवर्तित कर देगी।

भीड न्यायाधीश तब बनती है जब उसे पूरा यकिन हो कि उसे कोई सजा नहीं मिलेगी तथा इस भीड़ में भीड़ वालों की कोई पहचान नहीं होगी। जब भीड़ एक समुह के रूप में अपना नामकरण कर लेती है तो व्यक्तिगत पहचान गुम हो जाती है और व्यक्ति बैखोफ होकर क्रूरता करते हैं। भीड़ न्यायाधीश इसलिये भी बन जाती है क्योंकि उसका न्याय व्यवस्था पर भरोसा ही न हो। उसे लगता ही नहीं कि इस तथाकथित पकड़े गए मुजरिम को अदालत या व्यवस्था कोई सज़ा देगी। तो भीड़ के उत्पाती होने के दो कारण हैं एक तो न्याय का भय न होना तथा दूसरा कारण न्याय की उम्मीद ही न होना।

आजकल मोबाइल कैमरों से कुछ भीड़ वालों की पहचान होने लगी है इसलिए कुछ लोग डरने लगे हैं। यदि ऐसा हुआ कि सेटेलाइट कैमरे और विकसित होकर भीड़ में एक-एक व्यक्ति की पहचान कर ले तो शायद भीड़ में कुछ डर पैदा हो, लेकिन फिर भी न्याय से डर वांछित है। वर्ना न्याय के बिना साक्ष्य का कोई औचित्य नहीं है उल्टा ये तो और नाउम्मीदी पैदा करेगा। भीड़ तब तक न्यायाधीश बनती रहेगी, जब तक कि न्यायालय हर एक के साथ पूरा पूरा न्याय न करने लगे। न्याय होता दिखना न्याय का एक प्रमुख अंग है। न्याय का एक मात्र उद्देश्य भावी मुज़रिम को भावी ज़ुर्म करने से रोकना है…न्याय का भरोसा और डर दिखा कर।

इंसान मूल रूप से एक हिंसक पशु है, वह हिंसा करना चाहता है, वह कभी हिन्दू है तो मुसलमान से लड़ेगा, मुसलमान है तो हिन्दू से लड़ेगा, नहीं तो अपने ही मज़हब वालों से लड़ेगा या अपने मज़हब की दूसरी जाति वालों से लड़ेगा या अपनी ही जाति वालों से लड़ेगा, अगर इनसे लड़ने की कोई वजह नहीं मिली तो यह अपने परिवार वालों से लड़ेगा और परिवार में भी कोई लड़ने वाले नहीं मिला तो यह हिंसा का पुजारी खुद से ही लड़ने लगेगा…मरते दम तक यह हिंसा को पालता और पोसता रहेगा और भीड़ में इसकी हिंसा का ब्रीडिंग पीरियड शुरू हो जाता है, जिसमें यह उत्पात, उन्माद और हाहाकार मचा देता है, कत्ल करता है, लूट पाट मचाता है, आगजनी करता है, तोड़फोड़ करता है… क्यों? क्योंकि यह स्वभाव से हिंसक है। इसकी इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए ही कई धर्म आए, कई कानून बने, जिससे यह रुकता तो है, लेकिन प्रवृत्ति कब समाप्त होती है? हम खुद से पूछें क्या हम भी एक हिंसक पशु है?

पुनश्च: मेरी तीन साल की बेटी बाहर जब भी कोई गाड़ी की आवाज आती है तो दरवाजे पर दौड़ पड़ती है कि शायद मैं यानि उसका पिता आगया हूँ, वह उम्मीद लगाती है कि मैं आकर उसे लाड़ करूँगा, उसे घुमाउँगा या उसके लिए कोई खाने की चीज लाया हूंगा। मेरा पांच साल का बेटा मुझसे उम्मीद रखता है कि मैं उसकी सारी ज़िद पूरी करदुंगा उसे अपने पिता पर अपनी मासूमियत के कारण इतना यकीन है कि मैं उसके लिए आसमान से चाँद तोड़कर भी ला सकता हूँ। मेरी पत्नी मुझसे उम्मीद लगाए है कि हमारे परिवार में दुनिया की सारी खुशियाँ होंगी गम का कोई नाम न होगा। मेरी माँ को उम्मीद है कि मैं उसके बुढ़ापे का सहारा बनूँगा और उसका नाम रोशन करूँगा। मेरे भाई बहन को उम्मीद है कि मैं उनके हर अच्छे बुरे वक्त में साथ खड़ा रहूंगा…लेकिन एक दिन रोड़ पर मेरी गाड़ी से किसी को थोड़ी सी चोट लग जाती है। वह जिस घटना जिस जगह होती है वह उसी मामूली से चोटिल हुए व्यक्ति का एरिया था। उसके सब परिचित  आकर मेरी कार को घेर लेते हैं। कुछ कहा सुनी होती है और फिर मुझे भीड़ निर्दयता पूर्वक मार डालती है…

अब क्या होगा??? मेरी बच्ची तो अब भी आस लगाएगी और बेटा भी…क्योंकि उन्हें तो बरसो तक यकीन ही नहीं होगा कि उनके पिता नहीं रहे या उन्हें बहलाया जाएगा कि बेटा पापा काम से बाहर गए हैं। बाकि सब के सपने और अरमान सब टूट जाएंगे…ज़िन्दगी उलट पलट जाएगी…खुशियों को ग्रहण लग जायेगा। एक ऐसा ग्रहण जो कभी नही हटेगा।

मेरे साथ हो, आपके साथ हो या किसी और के साथ…लेकिन सबके साथ होगा यही…दुःख, दर्द, सदमा, बिख़राव, उजाड़…।

जब हम भीड़ बनकर किसी को मारेंगे तो उस एक के साथ कई लोग जीते जी मरेंगे या गम में मर जाएंगे। किसी मासूम और बेगुनाह को न मारे…सोचे एक बार उसके बारे में, उसके परिवार के बारे में। भीड़ हो या आतंकवाद किसी का हिस्सा न बने…क्योंकि यह आपको उनका कातिल बना देंगे जिन्होंने आपका कुछ नहीं बिगाड़ा। रुके, सोचे, समझे…और कातिल बनने से खुद को रोक ले। याद रखें हज़ारों की भीड़ जब एक व्यक्ति को मारती है तो मरता तो एक आदमी ही है लेकिन उस वक़्त हज़ारों नए हत्यारे पैदा हो जाते हैं।

-डॉ.अबरार मुल्तानी

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