युवाओं में भटकाव न आए

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मप्र भाजपा के एक नेता ने कहा है कि ब्राह्मणों में असुरक्षा का भाव बहुत तेजी से आ रहा है| इस वर्ग की मदद की जरूरत है ताकि जातिवादी जहर से गुजर रही राजनीति के कारण उसके युवाओं में भटकाव न आए|

मेरा उनसे विनम्र निवेदन है कि उनके पास यह सूचना कहां से और कैसे आई कि किसी ने गुप्त रूप से सारी ‘मही’ को ब्राह्मणविहीन करने की शपथ ले ली है ? जिस जहर से गुजरती राजनीति की आप बात कर रहे हैं, उसमें सबसे आगे तो आपका ही दल है और उस दल में आपकी हैसियत अच्छी खासी है| ईश्वर की कृपा से आप राजनीति के उन प्रतिभागियों या खिलाड़ियों में से एक हैं, जो उच्च शिक्षित हैं| आपमें और अपढ़ या कुपढ़ राजनेताओं में फरक है| कोई एक उदाहरण साक्ष्य सहित दे पाएंगे कि समाज के रूप में ब्राह्मण किसी से डरे हुए हैं ?

आपसे अपेक्षा है कि राजनीति में व्याप्त जहर की चिकित्सा आप उसके अंदर ही रहकर करें| ईश्वर की कृपा से वहां भी आपकी हैसियत अच्छी है| एक अच्छे चिकित्सक की तरह डराएं नहीं,इलाज़ करें| क्या सरकारी नौकरी ही जीवन का अंतिम सत्य है ? और यह तो बताएं कि देश के सवा सौ करोड़ नागरिकों में से कितने सरकारी नौकरी में हैं ? निजी तौर पर मैं भी, आरक्षण या उसके लिए अब होने वाले संघर्ष का समर्थक नहीं हूं, लेकिन इतना जानता हूं कि सरकारी नौकरी को किसी को भी अंतिम लक्ष्य नहीं बनाना चाहिए| वे हमारे ही पूर्वज थे, जो ‘स्वयंमेव मृगेन्द्रता’ लिख गए हैं| शेर किसी आरक्षण या जुगाड़ या किसी की कृपा से जंगल का राजा नहीं बनता| वहां उसका पौरुष ही सहायक होता है|

चूंकि आरक्षण प्राप्त कर आगे बढ़ने वालों ने अपनी ओर से अपने समाज-बंधुओं के लिए कुछ नहीं किया इसलिए न वे अपने समाज में प्रतिष्ठित हैं, न शेष समाज में| इसलिए चाहिए यह कि सब पर सबका भरोसा हो| सबको सब निर्भय करें| समाज का कोई अन्य वर्ग कहता है कि वह असुरक्षित है तो हम ही तो पूछते हैं कि क्यों और किससे डरते हो ? निजी राजनैतिक एजेंडा अलग बात है|

–कमलेश पारे

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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