अहं की जंग की चर्चा भोपाल तक !

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दो विभागों के प्रमुखों के बीच चल रही अहं और टुच्चेपन की जंग की चर्चा भोपाल तक पहुंच गई है। एक ने आदेश जारी कर एसडीएम को अपने मातहत बुलाना चाहा तो दूसरे ने निगम विधान और महापौर की शक्तियों का हवाला देकर उस आदेश की हवा निकाल दी। लड़ाई यहीं नहीं थमी इगो तीन इंची डिवाइडर दस इंच का। कलेक्टोरेट से आदेश का ऐसा ब्रह्मास्त्र चला कि तीन मंदिरों के कायाकल्प की सेवा से भी अप्रत्याशित तरीक़े से मुक्त होना पड़ा। इन दो समझदार अधिकारियों में एक कलेक्टर हैं और दूसरे बस कलेक्टर होने की कगार पर खड़े हैं। जिस एसडीएम स्तर के अधिकारी के लिए आदेश के बदले जवाबी आदेश की फ़ाइलें चलीं, वे अधिकारी भी कोई दूध के धुले नहीं हैं। गेहूं के साथ घुन भी पिस जाने की हालत हुई है विकास प्राधिकरण के सीईओ की।

निगमायुक्त मनीष सिंह जैसी क़िस्मत शायद ही किसी अन्य अधिकारी की हो। यह इसलिए कि उन्हें इंदौर के कलेक्टर से सीखने को मिल रहा है कि कलेक्टर बनने पर मौक़े बे मौक़े कितनी नफ़ासत से अपने पद के ग़ुरूर को दिखाना चाहिए।
आईएएस अवॉर्ड घोषित होने के बाद निगमायुक्त के रूप में मनीष सिंह अब कुछ दिनों के ही मेहमान हैं। वैसे तो भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर जैसी बड़ी नगर निगमों में निगमायुक्त पद पर किसी आईएएस को ही पदस्थ किया जाता है। ऐसे में मनीषसिंह इंनपानि के लिए ठीक हैं, लेकिन तीन साल से अधिक होने और कुछ महीनों में लागू होने वाली आचार संहिता के कारण उन्हें इंदौर जिला यूं भी छोड़ना है। सीएम की पसंद के अधिकारी होने के साथ महापौर मालिनी गौड़ की सिफ़ारिश के चलते उन्हें मनपसंद उज्जैन या अन्य किसी महत्वपूर्ण जिले की कमान मिलना भी तय है।

जिले में जाकर वे किस अंदाज में कलेक्टरी करें और डीएम के पद की गरिमा न समझने वाले अधिकारियों को कैसे ठीक करें यह गुरुमंत्र कलेक्टर निशांत बरवड़े ने विदाई तोहफ़े के रूप में मनीष सिंह को दे भी दिया है। अपने आईएएस के पूरे कैरियर में इस सीख को न सिर्फ वे याद रखेंगे बल्कि भविष्य में फिर ऐसी स्थिति न बने इसका भी ख़याल रखेंगे। मनीष सिंह के संबंध में यदि यह प्रचारित है कि उनकी ऊपर तक पकड़ मज़बूत है तो कलेक्टर निशांत वरवड़े ने भी उनके स्थान पर गौतम सिंह को तीनों मंदिरों के प्रशासन का प्रभार सौंप कर बता दिया है कि यहां से पहले वे भोपाल में कलेक्टर रहते सीएम निवास तक यूं ही प्रिय नहीं थे, उनका भी काम बोलता था।

क़िस्सा कुछ यूं है कि एसडीएम-एआईसीटीएल प्रभारी संदीप सोनी को सीईओ पद से हटाकर कलेक्टर ने एसडीएम के रूप में कलेक्टोरेट में पदस्थ कर दिया था लेकिन बाद में महापौर के हस्तक्षेप के चलते कलेक्टर को अपना यह निर्णय वापस लेना पड़ा था। इसके पीछे तर्क दिए गए थे कि कंपनी की अध्यक्ष महापौर हैं इसलिए सीईओ को बदलने का अधिकार महापौर को ही है। कलेक्टर के आदेश को मिली इस चुनौती पर यह प्रचारित किया गया कि मनीष सिंह और कलेक्टर के बीच बीते कुछ समय में इगो का डिवाइडर दस इंची का हो गया है इसीलिए कलेक्टर के इस आदेश को महापौर का हवाला देकर मनीष सिंह ने रद्द कराया है।

बात यहीं खत्म नहीं हुई अब निशांत वरवड़े ने नया आदेश जारी कर जिले के तमाम अधिकारियों को भी मैसेज दिया है कि जिले में तो कलेक्टर ही सब कुछ होता है। आदेश यह है कि खजराना गणेश मंदिर, रंजीत हनुमान मंदिर और बिजासन माता मंदिर के प्रशासक का चार्ज कलेक्टर ने इंदौर विकास प्राधिकरण के सीईओ गौतम सिंह को सौंप दिया है। दो वरिष्ठ अधिकारियों के बीच जिस अधिकारी (संदीप सोनी) के कारण संबंधों में खटास पैदा हुई है तो उन अधिकारी की कार्यप्रणाली ‘जिधर दम, उधर हम’ वाली रही है।बहुत संभव है कि पदोन्नत होकर जाने वाले मनीष सिंह को कुछ महीनों बाद यह सुनने को मिले कि सोनी अब कलेक्टर की आंख का तारा हो गए हैं। यह सिर्फ एक अधिकारी के कारण सामने आया मतभेद नहीं है। इसके साथ शहर के संवेदनशील क्षेत्र में गहन चुनौतियों के बीच चलाया अतिक्रमण विरोधी अभियान और उस दौरान कलेक्टर से कहीं अधिक पॉवरफुल होकर निगमायुक्त का उभरना भी है।

देखा जाए तो गौतमसिंह को उक्त तीन मंदिरों का प्रशासक बनाने में नया कुछ नहीं है। प्रशासनिक खेमे में इस आदेश को लेकर जो अचरज है वह यह कि अभी जब कि मनीष सिंह की नई पदस्थापना संबंधी आदेश नहीं जारी हुए हैं तो इस आदेश में इतनी जल्दबाज़ी क्यों? वैसे भी सिंह के जाने के बाद मंदिरों के प्रशासक के रूप में किसी के तो आदेश कलेक्टर ही जारी करते। कहीं उनके जारी किए आदेश में यह संदेश तो नहीं पा है कि अगले निगमायुक्त गौतमसिंह ही होंगे, यह संकेत कलेक्टर को सीएम हाउस से मिल गए है। करीब चार हजार करोड़ के बजट वाली इंनपानि का अगले निगमायुक्त की दौड़ में कई अधिकारी प्रयासरत हैं, कौन होगा यह तो मनीषसिंह के आदेश वाली सूची के साथ ही स्पष्ट होगा, लेकिन इन मंदिरों के प्रशासक को बदलने का अधिकार कलेक्टर को है इसलिए उन्होंने अपने विवेक का उपयोग करते हुए जल्दबाजी में प्रशासक बदलकर मनीष सिंह को अपने कलेक्टर होने का अहसास तो करा ही दिया है।

-कीर्ति राणा

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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