गहलोत के आगे फेल होते दिग्विजयसिंह

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दिग्विजयसिंह और अशोक गहलोत कांग्रेस के दो ऐसे दिग्गज नेता हैं, जिन्हें हर कोई जानता है। कांग्रेस में इनकी जगह कोई नहीं ले सकता है। कांग्रेस पार्टी में जब कोई चुनावी मिशन बनाने की बात होती है तो सबसे पहले इन दोनों दिग्गज नेताओं का नाम सबसे पहले आता है। दोनों के राजनीतिक करियर ने एक साथ रफ्तार पकड़ी, लेकिन समय ने ऐसी करवट बदली कि एक का कद लगातार बढ़ता जा रहा है तो दूसरा ढलान पर है।

कभी राहुल गांधी के राजनीतिक गुरु कहलाने वाले दिग्विजयसिंह अब कांग्रेस के सियासी फ्रेम से बाहर होते जा रहे हैं वह भी उस समय, जब मध्यप्रदेश में चुनावी शंखनाद हो चुका है। पूर्व सीएम दिग्विजयसिंह की राहुल गांधी से दूरी बढ़ती दिख रही है| साथ ही कांग्रेस के कार्यक्रमों में जिस तरह उन्हें अनदेखा किया जा रहा है, उससे साफ लगता है कि उनके राजनीतिक जीवन का पतन शुरू हो गया है। जहां एक ओर कांग्रेस के दिग्गी राजा का राजपाट कमज़ोर पड़ता जा रहा है वहीं दूसरी ओर अशोक गहलोत कामयाबी के दूसरे नाम के रूप में देखे जाने लगे हैं, लेकिन क्या वजह है कि अचानक राहुल के सबसे ज्यादा करीबी दिग्विजयसिंह को पर्दे के पीछे धकेला जा रहा है।

दिग्विजयसिंह और अशोक गहलोत का राजनीतिक सफर साथ ही शुरू हुआ, लेकिन गहलोत 1998 में मुख्यमंत्री बनने से पहले केंद्र में भी सक्रिय रहे, जबकि दिग्विजय के हाथ में ताकत 1993 में मप्र के मुख्यमंत्री बनने के बाद आई। हालांकि अशोक गहलोत ने सीएम बनने के बाद राष्ट्रीय राजनीति से अपने आपको दूर रखा और राजस्थान तक सीमित रहे। दोनों ही दो बार अपने-अपने राज्यों के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हुए। बस अंतर इतना है कि दिग्विजय ने अपने दोनों कार्यकाल एक साथ पूरे किए, जबकि अशोक गहलोत को अपने दूसरे कार्यकाल से पहले एक बार हार का सामना करना पड़ा। दिग्विजयसिंह उन चुनिंदा नेताओं में से हैं, जिन्होंने सबसे पहले इस बात को माना कि चुनाव मैनेजमेंट से जीते जाते हैं।

अपने बात को साबित करने में दिग्विजय बहुत वक्त तक कांग्रेस के हित में अपने मैनेजमेंट के फंडे लगाते रहे, लेकिन अचानक उनके सारे निशान चूकने लगे। फिर चाहे 2013 में मध्यप्रदेश में कांग्रेस की वापसी की बात हो या 2014 में मोदी लहर से लड़ना हो। दिग्विजय को जिन राज्यों में जिम्मेदारी सौंपी गई, वहां भी हार का सामना करना पड़ा। यहां तक कि गोवा विधानसभा चुनाव में तो कांग्रेस की सबसे बड़ी पार्टी बनने के बाद भी दिग्विजयसिंह वहां सरकार बनाने में असफल रहे। शायद यही वजह है कि पार्टी में उनका कद लगातार घटता जा रहा है।

केंद्र में अशोक गहलोत की दूसरी पारी तब शुरु हुई, जब दिग्विजय राष्ट्रीय राजनीति में बड़े लीडर के रूप में स्थापित हो चुके थे, लेकिन धीरे-धीरे कदम से आगे बढ़ने वाले अशोक गहलोत का कद लगातार बढ़ते जा रहा है। वे इस वक्त कांग्रेस में महासचिव जैसे तीसरे सबसे महत्वपूर्ण पद पर काबिज हैं। इसका कारण है उनका रणनीतिक कौशल और ज़मीनी समीकरणों को समझने की शक्ति।

यही कारण है कि कांग्रेस की नैया पार लगाने की जिम्मेदारी अशोक गहलोत के कंधों पर आई तो इसका असर देखे को मिला। अहमद पटेल को राज्यसभा पहुंचाने से लेकर गुजरात, पंजाब और कर्नाटक चुनाव में गहलोत का असर देखने को मिला। भाजपा के कट्टर हिंदुत्व के मुकाबले कांग्रेस के सॉफ्ट हिंदुत्व वाली रणनीति भी अशोक गहलोत की उपज मानी जाती है। इसी तरह मप्र में चार कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर जातियों को साधने के साथ दिग्गजों की फौज और ज़मीन पर काम करने वाले नेताओं को तैयार करना भी गहलोत का दिमाग था। इसके अलावा चुनाव से पहले कमलनाथ और सिंधिया के बीच प्रचार में जो समन्वय दिख रहा है, उसके पीछे भी गहलोत की रणनीति बताई जाती है। शायद यही वजह के अशोक गहलोत का जादू पार्टी में चलने लगा है और दिग्गी राजा की नीतियां भी नाकाम होती जा रही है।

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