क्या विपक्ष का कार्य सिर्फ हंगामा करना है

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विगत दिनों संसद में हंगामे की खबर सुर्ख़ियों में रही है| संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण का सारा समय विपक्ष की अनावश्यक बहस और हंगामे की भेंट चढ़ गया| विपक्ष के हंगामे की वजह से संसद सत्र में जरुरी मुद्दों पर चर्चा नहीं हो पाई|

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी विपक्ष के इस रवैये की आलोचना की, वहीं सत्र के दौरान विपक्षी दलों द्वारा रचनात्मक भूमिका न निभाए जाने के खिलाफ भाजपा सांसदों ने 12 अप्रैल को देशभर में अनशन करने का निर्णय लिया है| 2000 के बाद  यह अब तक का सबसे कम कामकाज वाला सत्र रहा| बता दें कि इस तरह संसद सत्र के निरर्थक रहने से देश की जनता के 190 करोड़ रुपए भी अकारण बर्बाद हो गए|

किसानों और गरीबों की बेहतरी की बात करने वाले विपक्ष के नेताओं ने यह नहीं सोचा कि यह बर्बाद किए गए रुपए देश के किसानों के काम आ सकते थे| एक विकासशील देश में पानी की तरह बहाए गए ये रुपए लाखों गरीबों, बेरोजगारों और जरूरतमंदों का कल्याण करने में सक्षम थे, लेकिन दुर्भाग्यवश उचित प्रबंधन के अभाव में यह विपक्ष की हठधर्मिता की भेंट चढ़ गया, लेकिन सवाल यह है कि समय और पैसे के इस नुकसान की जवाबदारी कौन लेगा?

स्पष्ट है कि संसद सत्र में कार्यवाही न होने से एक बार फिर देश की जनता की उम्मीदों पर पानी फिरा है| देश में ऐसी कई समस्याएं हैं, जिनका निवारण हंगामे से ज्यादा महत्वपूर्ण है, ऐसे में सदन पर किसी भी विषय पर चर्चा नहीं हो पाना चिंता का विषय है|

जनादेश का अपमान कर राजनीतिक लाभ के लिए संसद सत्र को बाधित करना देशहित में नहीं है। जिस तरह कुछ सांसद संसद सत्र को बाधित करने में लगे थे, उससे नहीं लगता कि बेहतर शासन के प्रति हमारे माननीय गंभीर हैं|

बहरहाल किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता पक्ष और विपक्ष एक गाड़ी के दो पहिये के समान होते हैं| लोकतंत्र की जीत के लिए इसके दोनों पहियों का स्वस्थ और सही दिशा में गतिमान होना निहायत जरूरी है| लोकतंत्र की सफलता दोनों पक्षों की सक्रियता पर निर्भर करती है, लेकिन आजादी के सात दशक बाद भी आज संसद और विधानसभाओं में जो कुछ देखने को मिल रहा है, वह हमारे लोकतंत्र की परिपक्वता और विश्वसनीयता पर अंगुली उठाने के लिए काफी है| लोकतंत्र में विपक्ष की उपस्थिति संजीवनी के समान है| यह सत्ता पक्ष को उचित दिशा में कार्य करने को मजबूर तो करता ही है, साथ ही लोकतंत्र राजतंत्र का रूप न ले ले, इसकी भी गारंटी देता है| लेकिन ध्यान रहे बहस और आलोचनाएं केवल सकारात्मक दिशा में हों। एक लोकतान्त्रिक देश में विपक्ष का ये रवैया हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या वाकई लोकतंत्र का सम्मान कर रहे हैं?

-अंकिता सिंह

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